आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णद्वैपाय़नेनेदं कृतं पुण्यचिकीर्षुणा ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
कृष्णद्वैपाय़नो राजन्नज्ञातचरितं चरन् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णद्वैपाय़नो व्यासो वेदव्यासो महानृषिः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
कृष्णनेत्रो महावाहुर्देवैरपि दुरासदः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां रात्रावस्य पुरोचनः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
कृष्णपक्षे चतुर्दश्यामभिगम्य वृषध्वजम् |
६२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
कृष्णपक्षे दशम्यादौ वर्जय़ित्वा चतुर्दशीम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
कृष्णपक्षे पिवन्त्येके भुञ्जते च यथाक्रमम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णपार्थौ जिघांसन्तः क्रोधसंमूर्च्छितौजसः ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णपार्थौ जिघांसन्तः प्रतीय़ुर्विविधाय़ुधाः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
कृष्णपार्थौ महेष्वासौ व्यतिक्रम्याथ ते सुतः |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
कृष्णपुच्छं महाकाय़ं मधुपिङ्गललोचनम् |
१०७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
कृष्णप्रधानाः संहत्य पर्युपासन्त भारत ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
कृष्णमक्लिष्टकर्माणमासाद्याय़ं सुदुर्मतिः |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णमाह्वय़तामद्य युद्धे शार्ङ्गगदाधरम् |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णमेघनिभाश्चान्या धूम्राश्च भरतर्षभ |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
कृष्णवर्णः सुवर्णश्च इन्द्रिय़ः सर्वदेहिनाम् |
८२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
कृष्णवर्त्मा युगान्ताभो येनाय़ं मथितो गिरिः ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
कृष्णवर्त्मेव ज्वलितः समिद्धो; यथा दहेत्कक्षमग्निर्निदाघे |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१८
कद्रूरु उवाच
कृष्णवालमहं मन्ये हय़मेनं शुचिस्मिते |
४ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
कृष्णशुक्लावुभौ पक्षौ गय़ाय़ां यो वसेन्नरः |
८४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
कृष्णश्च परिघस्तत्र भानुमावृत्य तिष्ठति |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
कृष्णश्च भृशसन्तप्तो दृष्ट्वा पार्थं विचेतसम् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
कृष्णश्च युय़ुधानश्च महात्मानौ महाद्युती ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
९
नारद उवाच
कृष्णश्च लोहितश्चैव पद्मश्चित्रश्च वीर्यवान् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
कृष्णश्च समरश्लाघी तावत्संशाम्य पाण्डवैः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णश्च सुमहातेजाश्चक्रेणारिनिहा तदा |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
कृष्णश्च स्रष्टा जगतो रथं तमभिरक्षति |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
कृष्णश्यावच्छविच्छाय़ः षण्मासान्मृत्युलक्षणम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णसंमाननार्थं च नगरं समलङ्कृतम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
कृष्णसर्पो यथा मुक्तो वल्मीकं नृपसत्तम |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
कृष्णस्तद्भावय़ोगाच्च कृष्णो भवति शाश्वतः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णस्तु पार्थेन समेत्य विद्वा; न्धनञ्जय़ेनासुरतर्जनेन |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१२०
युधिष्ठिर उवाच
कृष्णस्तु मां वेद यथावदेकः; कृष्णं च वेदाहमथो यथावत् ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णस्तु सह पार्थाभ्यां श्रिय़ा परमय़ा ज्वलन् |
४३ क
सभा पर्व
अध्याय
१
अर्जुन उवाच
कृष्णस्य क्रिय़तां किञ्चित्तथा प्रतिकृतं मय़ि ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
कृष्णस्य च तथास्मत्तो मित्रमन्यन्न विद्यते ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णस्य भवने रम्ये रत्नभोज्यसमावृते |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णस्य मतमाज्ञाय़ प्रय़यौ भरतर्षभः ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५९
युधिष्ठिर उवाच
कृष्णस्य मतमास्थाय़ विजितेय़ं वसुन्धरा ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
कृष्णस्य यज्ञः सत्यवत्याः सुतस्य; स्वय़ं च कर्म प्रचकार यत्र |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णस्य वचनं श्रुत्वा धृतराष्ट्रो जनेश्वरः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
कृष्णस्य वर्णस्य गतिर्निकृष्टा; स मज्जते नरके पच्यमानः |
३७ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णस्य संनिधौ रामः सहितः कृतवर्मणा |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णस्य सदृशं शौर्ये वीर्ये रूपे तथाकृतौ |
७० क
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
कृष्णस्य हि कृते भूतमिदं विश्वं समर्पितम् ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
कृष्णा केशैः प्रतिच्छाद्य मुखमाय़तलोचना |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
कृष्णा च कृष्णवेण्णा च कपिला शोण एव च |
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णा च क्षौमसंवीता कृतकौतुकमङ्गला |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णा च गृह्याजिनमन्वय़ात्तं; नागं यथा नागवधूः प्रहृष्टा |
४ क