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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
कृपणं स्वरथे सन्नं पश्य कृष्ण यथा गतम् ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
कृपणत्वं निविष्टं च कृष्णेऽर्घ्यस्य निवेदनात् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
च्यवन उवाच
कृपणस्य च यच्चक्षुर्मुनेराशीविषस्य च |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
कृपणाः परितप्यन्ते तेऽनर्थैः परिचोदिताः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
कृपणानां हि रुदतां कृतमश्रुप्रमार्जनम् ||
११३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
कृपणानाथवृद्धानां दुर्वलातुरय़ोषिताम् |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७८
राजो उवाच
कृपणानाथवृद्धानां दुर्वलातुरय़ोषिताम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
कृपणानाथवृद्धानां यदाश्रु व्यपमार्ष्टि वै |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
कृपणानाथवृद्धानां विधवानां च योषिताम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
कृपणानामनुक्रोशं कुर्याद्वो रुदतामिह ||
६४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
मातो उवाच
कृपणानामसत्त्वानां मा वृत्तिमनुवर्तिथाः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५७
भीष्म उवाच
कृपणान्सततं दृष्ट्वा ततः सञ्जाय़ते कृपा |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
कृपणाश्रुपरिक्लेदो दहेन्मां शाश्वतीः समाः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
कृपणास्त्वनुतप्यन्ते जनाः सम्वन्धिमानिनः ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
कृपदुःशासनाभ्यां च जय़द्रथमुखैस्तथा |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
कृपप्रभृतय़ः कर्ण हतशेषाश्च सोदराः ||
११ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
कृपप्रभृतय़श्चैव किमकुर्वत ते त्रय़ः ||
२ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
कृपप्रभृतय़श्चैव युय़ुत्सुं पर्यवारय़न् |
२५ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
कृपमभ्यर्च्य च गुरुमर्थमानपुरस्कृतम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १३१
वैशम्पाय़न उवाच
कृपमाचार्यपुत्रं च गान्धारीं च यशस्विनीम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
कृपमेकेन विव्याध कृतवर्माणमष्टभिः ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
कृपमेकेन विव्याध चित्रसेनं त्रिभिः शरैः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च कृतवर्मा च चित्रसेनो विविंशतिः |
४ क
स्त्री पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
कृपश्च कृतवर्मा च द्रोणपुत्रश्च भारत ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च कृतवर्मा च द्रौणिः शल्योऽथ सौवलः ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
कृपश्च कृतवर्मा च द्रौणिश्च जय़तां वरः ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च कृतवर्मा च द्रौणिश्चैव महारथः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च कृतवर्मा च द्रौणिश्चैव महावलः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च कृतवर्मा च धृष्टकेतुमभिद्रुतौ ||
२१ ग
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च कृतवर्मा च पुत्रं तेऽभिपरीप्सवः ||
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च कृतवर्मा च प्रय़युर्यत्र सौवलः |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च कृतवर्मा च भगदत्तमनुव्रतौ ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च कृतवर्मा च भगदत्तश्च मारिष |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
कृपश्च कृतवर्मा च भारद्वाजस्य चात्मजः ||
६४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च कृतवर्मा च शकुनिश्चापि सौवलः |
१६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च कृतवर्मा च शिविरद्वार्यतिष्ठताम् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च कृतवर्मा च शैव्यश्चैव महारथः |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च कृतवर्मा च सैन्धवश्च जय़द्रथः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च कृतवर्मा च सौवलश्च महावलः |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च तस्यैव जघान सूतं; षड्भिः शरैः सोऽभिमुखं पपात ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
कृपश्च भोजश्च तथात्मजश्च ते; तमोनुदं वारिधरा इवापतन् |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च मद्रराजश्च द्रौणिश्च रथिनां वरः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च मद्रराजश्च षडेतेऽस्य पुरोगमाः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च रथिनां श्रेष्ठः कौरव्यममितौजसम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च वृषसेनश्च शलः शल्यश्च दुर्जय़ः ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च शल्यश्च विविंशतिश्च; दुर्योधनः सौमदत्तिश्च राजन् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
कृपश्च सञ्जय़श्चैव शममेव वदिष्यतः ||
४५ ग
भीष्म पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
कृपश्च समरे राजन्माद्रीपुत्रं महारथम् |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
कृपश्च सोमदत्तश्च निर्विण्णाः कुरवस्तथा ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८७
वैशम्पाय़न उवाच
कृपश्च सोमदत्तश्च महाराजश्च वाह्लिकः |
१४ क