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वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
कृत्यं हि योऽभिजानाति सहस्रे नास्ति सोऽस्ति वा ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्यकाल उपस्थास्य इति चोक्त्वा घटोत्कचः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्यकाल उपस्थास्ये पितृनिति घटोत्कचः |
३७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्यकाले समुत्पन्ने पृच्छेथाः कार्यमात्मनः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
कृत्यमागमने चैव वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ||
७५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
कृत्यमानानि गात्राणि परैर्नैवाववुध्यते ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९५
वामदेव उवाच
कृत्यशेषेण यो राजा सुखान्यनुवुभूषति ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
कृत्यस्यानन्तरापेक्षी शैनेय़ं शिनिपुङ्गवम् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्या नृशंसा ह्यधने धिगस्त्वधनतामिह ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
कृत्या पपात मेदिन्यां भस्मसाच्च जगाम ह ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्या समुत्थिता राजन्किं करोमीति चाव्रवीत् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०६
गुरुरु उवाच
कृत्या ह्येता घोररूपा मोहय़न्त्यविचक्षणान् |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
कृत्यानामभिशस्तानां दुरिष्टशमनं महत् |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
कृत्यानि पूर्वं परिसङ्ख्याय़ सर्वा; ण्याय़व्ययावनुरूपां च वृत्तिम् |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
कृत्यामथर्वाङ्गिरसीमिवोग्रां; दीप्तामसह्यां युधि मृत्युनापि ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय १२४
लोमश उवाच
कृत्यार्थी सुमहातेजा देवं हिंसितुमुद्यतः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्रिमं भासमारोप्य वृक्षाग्रे शिल्पिभिः कृतम् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
कृत्वा कठिनभारं सा वृक्षशाखावलम्विनम् |
१०३ क
सभा पर्व
अध्याय ६६
दुर्योधन उवाच
कृत्वा कण्ठे च पृष्ठे च कः समुत्स्रष्टुमर्हति ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा कर्म प्राप्य कीर्तिं सुय़ुद्धे; वाजिग्रीवो मोदते देवलोके ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
युधिष्ठिर उवाच
कृत्वा कर्माणि पापानि कथं यान्ति शुभां गतिम् ||
१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
पितामह उवाच
कृत्वा कर्मातिसाध्वेतदशक्यममितप्रभः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
कृत्वा कार्यमकार्यं वा पुष्टिमेषां प्रय़च्छति ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
कृत्वा कुशलसंय़ुक्तां संविदं च यथावय़ः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
कृत्वा घोरं महद्रूपं ग्रहीतुमुपचक्रमे |
६४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
कृत्वा च कदनं तेषां प्रभाते विमलेऽहनि |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा च तच्छासनमस्य सर्वं; महेन्द्रमासाद्य निशामुवास ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ३९
सूत उवाच
कृत्वा च तेषां कार्याणि गम्यतामित्युवाच तान् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
कृत्वा च दक्षिणाग्रान्वै दर्भान्सुप्रय़तः शुचिः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २३५
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा च दुष्करं कर्म प्रीतिय़ुक्ताश्च पाण्डवाः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा च परमं रूपं सर्वाभरणभूषिता |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा च मध्ये राजानममात्यांश्च यथाविधि |
१० क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा च वेदाध्ययनं ततः सुचरितव्रताः |
८१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
यम उवाच
कृत्वा च संविदं तेन विससर्ज यथागतम् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
कृत्वा चाङ्गारको वक्रं ज्येष्ठाय़ां मधुसूदन |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
कृत्वा चाध्ययनं तेषां शिष्याणां शतमुत्तमम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
कृत्वा ज्ञातिक्षय़मिमं महान्तं लोभकारितम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १३४
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा जय़ाशिषः सर्वे परिवार्योपतस्थिरे ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १३
अर्जुन उवाच
कृत्वा तत्कर्म लोकानामृषभः सर्वलोकजित् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
कृत्वा तदस्त्रं तान्वीराननय़द्यमसादनम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा तु कुशलप्रश्नं सर्वेण नगरेण ते |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
कृत्वा तु नैरृतान्दर्भान्धीरो धौम्यः पुरोहितः |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा तु पाण्डवाः सर्वे रत्नाहरणनिश्चय़म् |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा तु पूजां रुद्रस्य गणानां चैव सर्वशः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
कृत्वा तु साधुष्वाख्येय़ं ते तत्प्रशमय़न्त्युत ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६
वृहस्पतिरु उवाच
कृत्वा तुभ्यं नमो विप्राः स्वकर्मविजितां गतिम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय २०४
नारद उवाच
कृत्वा त्रैलोक्यमव्यग्रं कृतकृत्यौ वभूवतुः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय २०१
नारद उवाच
कृत्वा दीक्षां गतौ विन्ध्यं तत्रोग्रं तेपतुस्तपः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा द्वादश वर्षाणि वीरस्थानाद्विशिष्यते ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३००
याज्ञवल्क्य उवाच
कृत्वा द्वादशधात्मानमादित्यो ज्वलदग्निवत् ||
४ ख