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उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
कथं ते नापराधोऽस्ति पाण्डवेषु महात्मसु ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
युधिष्ठिर उवाच
कथं ते पुरुषा जाताः का तेषां गतिरुत्तमा ||
१३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
कथं ते शोकनाशः स्यात्प्राणेषु च दय़ा प्रभो |
३५ क
विराट पर्व
अध्याय १५
द्रौपद्यु उवाच
कथं ते सूतपुत्रेण वध्यमानां प्रिय़ां सतीम् |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
कथं तेषां जय़ो न स्याद्येषां धर्मो व्यपाश्रय़ः ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
कथं तेषां जय़ो न स्याद्येषां योद्धा धनञ्जय़ः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
कथं तेषु न वर्तेय़ सम्यग्ज्ञानात्सुतेजसः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
कथं त्यक्त्वा महात्मा सन्गन्तुमिच्छस्यनागसम् ||
३६ ग
आदि पर्व
अध्याय ६५
दुःषन्त उवाच
कथं त्वं तस्य दुहिता सम्भूता वरवर्णिनी |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
कथं त्वं पतनं काक सहास्माभिर्व्रवीषि तत् ||
२१ ग
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
कथं त्वं पृथिवीपालान्भुक्त्वा तात समागतान् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६७
धृतराष्ट्र उवाच
कथं त्वं माधवं वेत्थ सर्वलोकमहेश्वरम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय २९१
वैशम्पाय़न उवाच
कथं त्वकार्यं कुर्यां वै प्रदानं ह्यात्मनः स्वय़म् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २७९
द्युमत्सेन उवाच
कथं त्वनर्हा वनवासमाश्रमे; सहिष्यते क्लेशमिमं सुता तव ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ११६
वैशम्पाय़न उवाच
कथं त्वमभ्यतिक्रान्तः शापं जानन्वनौकसः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १२३
लोमश उवाच
कथं त्वमसि कल्याणि पित्रा दत्ता गताध्वने ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय ९
विराट उवाच
कथं त्वमस्मासु निवत्स्यसे सदा; वदस्व किं चापि तवेह वेतनम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
भीष्म उवाच
कथं त्वहमसङ्क्लिष्टो गच्छेय़ं परमां गतिम् |
४९ क
विराट पर्व
अध्याय ३८
वृहन्नडो उवाच
कथं त्वा निन्दितं कर्म कारय़ेय़ं नृपात्मज ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
कथं त्वा विरथं वीरं द्रक्ष्याम्यन्यैर्निपातितम् ||
१५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
कथं त्वां रणमध्यस्थं जघ्नुरेते महारथाः |
१६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
कथं त्वां सर्वधर्मज्ञं क्षुद्रः पापो वृकोदरः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
दुर्योधन उवाच
कथं त्वामप्यतिक्रान्तः सर्वशस्त्रभृतां वरः |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय ६०
द्रौपद्यु उवाच
कथं त्वेवं वदसि प्रातिकामि; न्को वै दीव्येद्भार्यया राजपुत्रः |
५ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
कथं त्वय़ं शिशुः शेते लोके नाशमुपागते ||
८४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
कथं त्वय़ा रणे जेतुं राम शक्यो निवर्त वै ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
शक्र उवाच
कथं त्वय़ा वलिस्त्यक्तः किमर्थं वा शिखण्डिनि |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
कथं त्वय़ि च कर्णे च कृपे शल्ये च जीवति |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
कथं त्वय़ि स्थिते लोके शाश्वते लोककर्तरि |
१३ क
वन पर्व
अध्याय २६१
युधिष्ठिर उवाच
कथं दाशरथी वीरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ११६
वैशम्पाय़न उवाच
कथं दीनस्य सततं त्वामासाद्य रहोगताम् |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
कथं दुःखमिदं तीव्रं गान्धारी प्रसहिष्यति |
१३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
कथं दुर्योधनोऽस्माभिर्हत इत्यनपत्रपाः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
इन्द्र उवाच
कथं दुष्टं विजानीय़ादेतत्पृष्टो व्रवीहि मे ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय २१८
स्कन्द उवाच
कथं देवगणांश्चैव पाति नित्यं सुरेश्वरः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ७
सूत उवाच
कथं देवमुखो भूत्वा यज्ञभागाग्रभुक्तथा |
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
युधिष्ठिर उवाच
कथं देवर्षिरुशना सदा काव्यो महामतिः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
कथं द्रक्ष्यामि कौन्तेय़ं सौभद्रे निहतेऽर्जुनम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
कथं द्रक्ष्यामि वः सर्वान्स्वय़माहृतभोजनान् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
कथं द्रुपदपुत्रस्य धृष्टद्युम्नस्य पावकात् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १२९
धृतराष्ट्र उवाच
कथं द्रोणं महेष्वासं पाण्डवाः पर्यवारय़न् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
कथं द्रोणान्महेष्वासात्सर्वाण्यस्त्राण्यशिक्षत |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०५
सञ्जय़ उवाच
कथं द्रोणो जितः सङ्ख्ये धनुर्वेदस्य पारगः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
धृतराष्ट्र उवाच
कथं द्रोणो महेष्वासः पाञ्चाल्यश्चापि पार्षतः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९८
धृतराष्ट्र उवाच
कथं द्रोणो महेष्वासः पाण्डवश्च धनञ्जय़ः |
१ क
वन पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
कथं द्वादश वर्षाणि वने तेषां महात्मनाम् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५०
जनमेजय़ उवाच
कथं द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां तपोधनः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
कथं द्विजवर प्राणानधारय़त दुःखितः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
कथं द्वैतवने राजन्पूर्वमुक्त्वा तथा वचः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
मान्धातो उवाच
कथं धर्मं चरेय़ुस्ते सर्वे विषय़वासिनः |
१५ क