शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
कृतघ्नं पुरुषं तं च गौतमं पापचेतसम् ||
१४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
कृतघ्नः पुरुषव्याघ्र मनसेदमचिन्तय़त् ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
कृतघ्नता परवित्तापहारः; सुरापानं गुरुदारावमर्शः |
७४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
कृतघ्नश्चाधमो लोके न सन्धेय़ः कथञ्चन |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
कृतघ्नस्तु मृतो राजन्यमस्य विषय़ं गतः |
८० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
कृतघ्नस्तु स दुष्टात्मा तं जिघांसुरजागरत् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
कृतघ्नस्य नृशंसस्य भृशं विश्वासघातिनः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
कृतघ्ना नास्तिकाः पापा गुरुदाराभिमर्शिनः |
७८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
कृतघ्नाः सूर्यरश्मीनां ज्वलतामिव दर्शने ||
४१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
कृतघ्नोऽय़ं नृशंसोऽय़ं यथास्य जनकस्तथा |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
कृतचिन्ता न्यवर्तन्त ते च नागपुरं प्रति ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
कृतचिह्नं तु सुग्रीवं रामो दृष्ट्वा महाधनुः |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
कृतजप्यस्य तस्याथ वृद्धक्षत्रस्य धीमतः |
३८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
कृतजप्याह्निकः श्रीमानाश्रमं च जगाम ह |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
कृतजप्याह्विकास्ते तु हुत्वा वह्निं यथाविधि |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
कृतज्ञं कृतकल्याणं कच्चिन्मां नाभिशङ्कसे ||
११९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
कृतज्ञं ज्ञानसम्पन्नं कृतास्त्रमनिवर्तिनम् |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
कृतज्ञं धार्मिकं सत्यमक्षुद्रं दृढभक्तिकम् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
कृतज्ञं प्राज्ञमक्षुद्रं दृढभक्तिं जितेन्द्रिय़म् |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
कृतज्ञं वलवन्तं च क्षान्तं दान्तं जितेन्द्रिय़म् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
धृतराष्ट्र उवाच
कृतज्ञं सत्यनिरतं दुर्योधनहितैषिणम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
कृतज्ञः सह वृक्षेण धर्मात्मा स व्यशुष्यत ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
कृतज्ञतां दय़ां चैव भ्रातुस्त्वमनुचिन्तय़ ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
कृतज्ञानां वदान्यानां गुरुशुश्रूषिणामपि |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
कृतज्ञेन सदा भाव्यं मित्रकामेन चानघ |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
कृतज्ञो दृढभक्तिः स्यात्संविभागी जितेन्द्रिय़ः |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
कृतदारः शिखण्डी तु काम्पिल्यं पुनरागमत् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
कण्व उवाच
कृतदारो यथाकामं जगाम च गृहान्प्रति ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
कृतपद्माञ्जलिपुटा मत्तषट्पदसेविताः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
२०६
वैशम्पाय़न उवाच
कृतपुष्पोपहारेषु तीरान्तरगतेषु च ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
कृतपूजाविमौ तुल्यं त्वय़ा तुल्यफलाविमौ |
२७ क
विराट पर्व
अध्याय
२
भीम उवाच
कृतपूर्वाणि यैरस्य व्यञ्जनानि सुशिक्षितैः |
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
कृतपूर्वाह्णिकः प्राय़ात्सभार्यस्तद्वनं प्रति ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२८३
मार्कण्डेय़ उवाच
कृतपूर्वाह्णिकाः सर्वे समेय़ुस्ते तपोधनाः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
कृतपूर्विणस्तु त्यजतो महान्धर्म इति श्रुतिः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
कृतप्रज्ञश्च मेधावी वुधो जानपदः शुचिः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
कृतप्रज्ञस्य दान्तस्य वितृष्णस्य निराशिषः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
वलिरु उवाच
कृतप्रज्ञा ज्ञानतृप्ताः क्षान्ताः सन्तो मनीषिणः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
कृतप्रज्ञो वीतलोभो निरहङ्कार आत्मवान् |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
१९६
कर्ण उवाच
कृतप्रज्ञोऽकृतप्रज्ञो वालो वृद्धश्च मानवः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्राह्मण उवाच
कृतप्रज्ञोऽसि मेधावी वुद्धिश्च विपुला तव |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
कृतप्रतिकृतं दृष्ट्वा शल्यो विस्मितमानसः |
५५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
कृतप्रतिकृते यत्तौ योधय़ामासतू रणे ||
४६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
कृतप्रतिकृते यत्नं कुर्वाणौ च महारणे |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
कृतप्रतिकृते यत्नं चक्राते तावभीतवत् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
कृतप्रतिक्रिय़ं तेषां न नश्यति शुभाशुभम् ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२५
व्राह्मण उवाच
कृतप्रशास्ता तच्छास्त्रमपवर्गोऽस्य दक्षिणा ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
कृतप्रसादो राजा तं ततः समवतारय़त् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६२
वैशम्पाय़न उवाच
कृतप्रिय़श्चास्मि धनञ्जय़ेन; जेतुं न शक्यस्त्रिभिरेष लोकैः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
वैशम्पाय़न उवाच
कृतप्रिय़स्त्वय़ास्मीति तच्च ते किं प्रिय़ं कृतम् |
६ ख