भीष्म पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
एष शूरो महेष्वासो भीष्मः शत्रुनिषूदनः ||
२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
एष शेते महावाहुर्वलवान्सत्यविक्रमः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
एष शेते रथोपस्थे मद्वाणैरभिपीडितः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
नारद उवाच
एष शेषः स्थितो नागो येनेय़ं धार्यते सदा |
२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
एष शैलालय़ो राजा भगदत्तः प्रतापवान् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
एष शोकार्णवे मग्नस्तमाश्वासय़ माधव ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
एष श्रिय़ं समुदितां सर्वराज्ञां ग्रहीष्यति |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
एष श्रीमान्नृपसुतो धुन्धुमारो भविष्यति ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
मुनिरु उवाच
एष श्वरूपरहितो द्वीपी भवसि पुत्रक ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
एष षड्विधविस्तारो रसो वारिमय़ः स्मृतः ||
३० ग
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
एष संशप्तकाहूतस्तानेवाभिमुखो गतः |
५६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११४
वृहस्पतिरु उवाच
एष सङ्क्षेपतो धर्मः कामादन्यः प्रवर्तते ||
८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१९
गान्धार्यु उवाच
एष सङ्ग्रामशूरेण प्रतिज्ञां पालय़िष्यता |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
एष सञ्जीवय़ाम्येनं पश्यतां सर्वदेहिनाम् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
एष सन्दृश्यते पार्थो वासुदेवव्यपाश्रय़ः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
एष सप्तविधः प्रोक्तो गुण आकाशलक्षणः |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
एष सर्वाञ्शिवीन्हत्वा मुख्यशश्च नरर्षभान् |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
एष सर्वात्मना पाण्डूंस्त्रासय़ित्वा महारणे |
३५ क
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
एष सर्वान्महीपालान्करमाहारय़त्तदा |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
एष सर्वेषु भूतेषु क्षरश्चाक्षर एव च |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
शल्य उवाच
एष सारथ्यमातिष्ठे राधेय़स्य यशस्विनः |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
एष सूत रणे क्रुद्धः सात्वतानां महारथः ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
एष सूर्य इवाम्भोदैश्छन्नः पार्थो न दृश्यते |
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
एष सेनां वहुविधां विविधाय़ुधकार्मुकाम् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५
कर्ण उवाच
एष सेनाप्रणेतॄणामेष शस्त्रभृतामपि |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
एष सैन्यानि शत्रूणां विधमामि शितैः शरैः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
एष स्वर्गश्च धर्मश्च सुखं चानुत्तमं सताम् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
एष हन्याद्धि संरम्भी वलवान्सत्यविक्रमः |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
२२४
मन्दपाल उवाच
एष हि ज्वलमानोऽग्निर्लेलिहानो महीरुहान् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
एष हि व्राह्मणद्वेषी यज्ञद्वेषी च राक्षसः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
वासुदेव उवाच
एष ह्यनर्थे सततं पराक्रान्तस्तवानघ |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
एष ह्यप्रतिवुद्धश्च वुध्यमानश्च तेऽनघ |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
एष ह्यस्य महावाहो तेजोंशश्च हरेर्ध्रुवम् |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
एष ह्येको महातेजाः पाण्डुपुत्रो धनञ्जय़ः |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
एष ह्येषां समेतानां तेजोवलपराक्रमैः |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
एष ह्यैन्द्रो वैजय़न्तो गुणो नित्यं समाहितः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१४०
लोमश उवाच
एषा गङ्गा सप्तविधा राजते भरतर्षभ |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
एषा गतिरसक्तानामेष धर्मः सनातनः |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
एषा गतिर्विरक्तानामेष भावः परः सताम् ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७९
भरद्वाज उवाच
एषा गौः परलोकस्थं तारय़िष्यति मामिति |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
एषा गौरुत्तमा देवि वारुणेरसितेक्षणे |
१८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
एषा चामीकराभस्य तप्तकाञ्चनसप्रभा |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२५
युधिष्ठिर उवाच
एषा चैव कुरुश्रेष्ठ दुर्विचिन्त्या सुदुर्लभा |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
एषा ज्ञानवतां प्राप्तिरेतद्वृत्तमनिन्दितम् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
एषा तत्त्वचतुर्विंशा सर्वाकृतिषु वर्तते |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
एषा तस्यापि परीक्षा वेदस्य ||
८२ ग
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
एषा तस्यापि परीक्षोपमन्योः ||
७८ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
एषा तावदवुद्धीनां गतिरुक्ता युधिष्ठिर |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११४
नारद उवाच
एषा तावन्मम प्रज्ञा यथा वा मन्यसे द्विज ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
एषा तु विहिता शान्तिः पुत्राद्यां प्राप्तवानसि |
११ क