chevron_left  एवमेषामनीकानिarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
एवमेषामनीकानि प्रविभक्तानि भागशः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
एवमेषोऽसकृत्सर्वं क्रीडार्थमभिमन्यते ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
एवमैश्वर्यमासाद्य प्रशास्य पृथिवीमिमाम् |
६१ क
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
एवम्प्रकाराः सञ्जल्पाः श्रूय़न्ते स्मात्र नित्यशः ||
५० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
अश्व उवाच
एवम्प्रभावः स मुनिरुत्तङ्को भरतर्षभ |
५६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
श्रीरु उवाच
एवम्प्रभावां मां गावो विजानीत सुखप्रदाम् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
एवम्प्रभावो भगवानतो भूय़श्च पावकिः |
८१ क
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
एवम्प्राय़श्च लोकोऽय़ं मनुष्याः शक्तिपेशलाः |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय १२
युधिष्ठिर उवाच
एवम्प्राय़ाश्च दृश्यन्ते जनवादाः प्रय़ोजने ||
३९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
एवम्प्राय़ो हि धर्मोऽय़ं क्षत्रिय़ाणां नराधिप |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
एवम्प्रय़ोजनश्चैव दण्डः क्षत्रिय़तां गतः |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
एवम्भूता नरा देवि निरय़ं यान्त्यवुद्धय़ः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
एवम्भूते तदा लोके सङ्कुले भरतर्षभ |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०७
भीष्म उवाच
एवम्भूतेषु भूतेषु नित्यभूताध्रुवेषु च |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
एवम्भूतो नरो देवि निरय़ं प्रतिपद्यते |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
एवम्भूतो नरो देवि स्वर्गतिं प्रतिपद्यते |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
एवम्भूतो मृतो देवि देवलोकेऽभिजाय़ते ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
एवम्भूतो हि यो विप्रः सततं सत्पथे स्थितः |
५६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
एवम्वुद्धिः पाण्डवेषु मिथ्यावृत्तिः सदा भवान् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७५
भगवानु उवाच
एवम्वुद्धिः प्रवर्तेत फलं स्यादुभय़ान्वय़ात् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १३०
लोमश उवाच
एष उज्जानको नाम यवक्रीर्यत्र शान्तवान् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
एष एकान्तिधर्मस्ते कीर्तितो नृपसत्तम |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
एष एकान्तिनां धर्मो नाराय़णपरात्मकः ||
७६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ६७
व्यास उवाच
एष एकाय़नः पन्था येन यान्ति मनीषिणः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
एष एव क्रमो हि स्यात्क्षत्रिय़ाणां युधिष्ठिर |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
एष एव तु सर्वेषामकार्याणां विधिर्भवेत् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
एष एव परो धर्मो यद्राजा दण्डनीतिमान् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७२
भीष्म उवाच
एष एव परो धर्मो यद्राजा रक्षते प्रजाः |
२६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
एष एव परो धर्मो राजर्षीणां युधिष्ठिर |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
सृञ्जय़ उवाच
एष एव परो लाभो निर्वृत्तो मे महाफलः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय २०९
वर्गो उवाच
एष एव वधोऽस्माकं सुपर्याप्तस्तपोधन |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
कुशिक उवाच
एष एव वरो मुख्यः प्राप्तो मे भृगुनन्दन |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय ३२
शेष उवाच
एष एव वरो मेऽद्य काङ्क्षितः प्रपितामह |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
कुशिक उवाच
एष एव वरो मेऽद्य यत्त्वं प्रीतो महामुने |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
सुरभ्यु उवाच
एष एव वरो मेऽद्य यत्प्रीतोऽसि ममानघ ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
एष एव श्मशानेषु देवो वसति नित्यशः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
एष कर्णो महेष्वासो मतिमान्दृढविक्रमः |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
एष कर्णो रणे जित्वा पाञ्चालान्पाण्डुसृञ्जय़ान् |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
एष कर्णो रणे पार्थ पाण्डवानामनीकिनीम् |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
एष कर्ता च कार्यं च पूर्वदेवः स्वय़म्प्रभुः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
एष कर्ता न क्रिय़ते कारणं चापि पौरुषे |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
एष कर्ता विकर्ता च सर्वभावनभूतकृत् ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
एष कार्ष्णिर्महेष्वासो द्वितीय़ इव फल्गुनः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
एष कालगतिश्चित्रा संवत्सरय़ुगादिषु |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
धर्म उवाच
एष कालस्तथा मृत्युर्यमश्च त्वामुपागताः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
एष कालो महावाहो अपि सर्वदिवौकसाम् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
एष कुन्तीसुतः श्रीमानेष पाण्डवमध्यमः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९६
नारद उवाच
एष कृत्ये समुत्पन्ने तत्तद्धारय़ते वलम् |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
एष केतू रणे कृष्ण सूतपुत्रस्य दृश्यते |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
एष कौरवय़ोधानां कृत्वा घोरमुपद्रवम् |
१५ क