आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
एवं वीर्यवलोत्सिक्तैर्भूरिय़ं तैर्महासुरैः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
एवं वुद्धेः परं वुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
एवं वुद्ध्या सम्प्रपश्येन्मेधावी कार्यनिश्चय़म् ||
३८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२४१
व्यास उवाच
एवं वुद्ध्वा नरः सर्वां भूतानामागतिं गतिम् |
९ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
एवं वृष्ण्यन्धककुले श्रुत्वा मौसलमाहवम् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
एवं वेदमनुत्साद्य प्रज्ञां महति कुर्वते ||
२५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
एवं वेदविदित्याहुरतोऽन्यो वातरेटकः ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
एवं वै परमं धर्मं प्रशंसन्ति मनीषिणः |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
विदुर उवाच
एवं वै परमं धर्मं श्रुत्वा सर्वे सभासदः |
८० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
एवं वै भाव्यमेतेन क्षय़ं यास्यन्ति कौरवाः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४२
व्यास उवाच
एवं वै सर्वधर्मेभ्यो विशिष्टं मेनिरे वुधाः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१७७
युधिष्ठिर उवाच
एवं वै सुखदुःखाभ्यां हीनमस्ति पदं क्वचित् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
११७
अकृतव्रण उवाच
एवं वैरमभूत्तस्य क्षत्रिय़ैर्लोकवासिभिः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
एवं व्यवसिते लोके वहुदोषे युधिष्ठिर |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
एवं व्युत्क्रान्तधर्मेण व्युत्क्रम्य समय़ं हतः ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
ऋषय़ ऊचुः
एवं व्युत्थापिते धर्मे वहुधा विप्रधावति |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
एवं व्युष्टिमहं प्राप्तो व्राह्मणानां प्रसादजाम् |
५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्यूढान्यनीकानि कौरवेय़ेण धीमता ||
२२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
एवं व्यूढान्यनीकानि भीष्मेण तव भारत ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
एवं व्यूढेष्वनीकेषु भूय़िष्ठमनुवर्तिषु |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४२
धृतराष्ट्र उवाच
एवं व्यूढेष्वनीकेषु मामकेष्वितरेषु च |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
धृतराष्ट्र उवाच
एवं व्यूढेष्वनीकेषु मामकेष्वितरेषु च |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
एवं व्यूह्य महत्सैन्यं पाण्डवास्तव वाहिनीम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
एवं व्रह्मानधीय़ानं राजा यश्च न रक्षिता |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
एवं व्रुवति कन्यां तु पार्थिवे होत्रवाहने |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
एवं व्रुवति कृष्णे तु धार्तराष्ट्रचमूं प्रति |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवति कौन्तेय़ विदुरे दीर्घदर्शिनि |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
एवं व्रुवति कौन्तेय़े दाशार्हस्त्वरितस्ततः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
एवं व्रुवति कौन्तेय़े धर्मात्मनि युधिष्ठिरे |
५५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
एवं व्रुवति कौरव्ये धर्मराजे युधिष्ठिरे |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवति दाशार्हे दुर्योधनममर्षणम् |
२१ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवति देवेन्द्रे कौरवेन्द्रं युधिष्ठिरम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवति भीमं तु धर्मराजे युधिष्ठिरे |
२९ क
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवति राजेन्द्रे कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवति विप्रेन्द्रे धृतराष्ट्रोऽम्विकासुतः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
एवं व्रुवति संहृष्टे प्रद्युम्ने पाण्डुनन्दन |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
एवं व्रुवति सूते तु तदा मकरकेतुमान् |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवत्यां करुणं दुःशलाय़ां धनञ्जय़ः |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवत्येव मधुप्रवीरे; शिनिप्रवीरः सहसोत्पपात |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवत्येव युधिष्ठिरे तु; पाञ्चालराजस्य समीपतोऽन्यः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
एवं व्रुवन्तं गाङ्गेय़मभिवाद्य प्रसाद्य च |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
२२४
मन्दपाल उवाच
एवं व्रुवन्तं दुःखार्तं किं मां न प्रतिभाषसे |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
६४
वृहदश्व उवाच
एवं व्रुवन्तं राजानं निशाय़ां जीवलोऽव्रवीत् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
एवं व्रुवन्तस्ते सर्वे प्रतिरुध्य रणाजिरम् |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
एवं व्रुवन्तस्तेऽन्योन्यं हृष्टरूपा विशां पते |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
२२१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवन्तीं शार्ङ्गास्ते प्रत्यूचुरथ मातरम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
एवं व्रुवन्तो योधास्ते तावका भय़पीडिताः |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवन्नेव तदा धृतराष्ट्रोऽम्विकासुतः |
१०७ क
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
एवं व्रुवन्नेव मुनिः स्वकार्यार्थं विचिन्तय़न् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवन्नेव यदुप्रवीरो; युधिष्ठिरं धर्मभृतां वरिष्ठम् |
८० क