कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
एवं गते तु यत्कार्यं भवेत्कार्यकरं नृपाः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१
कृष्ण उवाच
एवं गते धर्मसुतस्य राज्ञो; दुर्योधनस्यापि च यद्धितं स्यात् |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
१
अर्जुन उवाच
एवं गते न शक्ष्यामि किञ्चित्कारय़ितुं त्वय़ा ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
एवं गते नरश्रेष्ठ पाण्डवे सत्यवादिनि |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
एवं गते पाण्डवेय़ैर्विदितं वः पुरा यथा |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
एवं गते प्राप्तकालं कर्णानीके पुनः पुनः |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
एवं गते ममाचक्ष्व स्वय़ं निश्चित्य हेतुभिः ||
६८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
एवं गते महाराज न तवास्ति पराजय़ः ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
द्रोण उवाच
एवं गते महाराज युद्धादन्यत्किमिच्छसि ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
शल्य उवाच
एवं गते महाराज युद्धादन्यत्किमिच्छसि ||
७६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
एवं गते महाराज राज्यं प्रति जनाधिप |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
वृत्र उवाच
एवं गते मे न विषादोऽस्ति कश्चि; त्सम्यक्च पश्यामि वचस्तवैतत् |
५६ क
आदि पर्व
अध्याय
१९५
भीष्म उवाच
एवं गते विग्रहं तैर्न रोचय़े; सन्धाय़ वीरैर्दीय़तामद्य भूमिः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
एवं गते विदुर यदद्य कार्यं; पौराश्चेमे कथमस्मान्भजेरन् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
एवं गते वै यद्भावि तद्भविष्यति सञ्जय़ |
७ क
वन पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
एवं गते समतामभ्युपेत्य; पथ्यं तेषां मम चैव व्रवीहि ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं गतेषु पार्थेषु विसृष्टे च सुय़ोधने |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
एवं गतेऽपि तु मय़ा यच्छक्यं भृगुनन्दन |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
एवं गतेऽपि शक्योऽय़ं हन्तुं नान्येन केनचित् |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
एवं गावल्गणे क्षत्ता धर्मार्थसहितं वचः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
एवं गुणाः प्रकृतितो जाय़न्ते च न सन्ति च ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३७
भीष्म उवाच
एवं गृहस्थः कर्माणि कुर्वन्धर्मान्न हीय़ते ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
भीष्म उवाच
एवं गृहस्थधर्मं त्वं चेतय़ानो नराधिप |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
एवं गृहस्थमाश्रित्य वर्तन्त इतरेऽऽश्रमाः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२७
वैशम्पाय़न उवाच
एवं च त्वां पिता राजन्समनुज्ञातुमर्हति ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
एवं च मां वाग्विशिखैर्निहंसि; त्वत्तः सुखं न वय़ं विद्म किञ्चित् ||
८२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
एवं च मामुपस्थाय़ कस्माच्च विधिनार्हणाम् |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
एवं चक्रुरिमां सर्वे वशे कृत्स्नां वसुन्धराम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
एवं चतुर्णां वर्णानामाश्रमाणां प्रवृत्तिषु |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
एवं चतुर्मुखः स्थाणुर्महादेवोऽभवत्पुरा |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७१
भीष्म उवाच
एवं चरस्व राज्यस्थो यदि श्रेय़ इहेच्छसि |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
एवं चापि हि मे कामो नित्यमेव महारथ |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
एवं चावमतस्येह विश्वासं किं प्रय़ास्यसि |
७९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
एवं चित्रमभूद्युद्धं तस्य तैः सह भारत |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
एवं चिन्तापरिगतो दुःशासनमथाव्रवीत् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७६
अर्जुन उवाच
एवं चेत्कार्यतामेति कार्यं तव जनार्दन |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
एवं चेन्न महावाहुरन्याय़ेन हनिष्यति |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
एवं चेन्मन्यसे राजन्गान्धारे प्रिय़दर्शन |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
दारुक उवाच
एवं चैतत्करिष्यामि यथा मामनुशाससि |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
एवं चैव नरव्याघ्र लोकतन्त्रविघातकाः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
एवं चैव नरश्रेष्ठ रक्ष्या एव द्विजातय़ः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
१८७
युधिष्ठिर उवाच
एवं चैव वदत्यम्वा मम चैव मनोगतम् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
एवं चैषां वुध्यमानः प्रभावं; गत्वैवाहं ताञ्जय़ाम्यद्य सूत |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
एवं जातिशतैर्युक्तो गुणैरेव प्रसङ्गिषु |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
एवं जातिषु सर्वासु सवर्णाः श्रेष्ठतां गताः |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
एवं जीवः शरीराणि तानि तानि प्रपद्यते ||
५७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
एवं जीवितमादाय़ कर्णस्येषुर्जगाम ह ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
एवं ज्ञात्वा कथं मां त्वं सदोषं सर्प मन्यसे |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
कश्यप उवाच
एवं ज्ञात्वा कार्य एवेह विद्वा; न्पुरोहितो नैकविद्यो नृपेण ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः |
१५ क