शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
युधिष्ठिर उवाच
एतन्मे संशय़ं छिन्धि मनो मे सम्प्रमुह्यति |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२९
द्रौपद्यु उवाच
एतन्मे संशय़ं तात यथावद्व्रूहि पृच्छते ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
युधिष्ठिर उवाच
एतन्मे संशय़ं राजन्यथावद्वक्तुमर्हसि ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
जनमेजय़ उवाच
एतन्मे संशय़ं विप्र हृदि शल्यमिवार्पितम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
युधिष्ठिर उवाच
एतन्मे संशय़ं व्रूहि पृच्छतो भरतर्षभ |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३८
रुद्र उवाच
एतन्मे संशय़ं व्रूहि महत्कौतूहलं हि मे ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
युधिष्ठिर उवाच
एतन्मे संशय़ं व्रूहि विस्तरेण पितामह ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
जनमेजय़ उवाच
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व कुशलो ह्यसि भाषितुम् ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
धृतराष्ट्र उवाच
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व कुशलो ह्यसि सञ्जय़ ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व यथातत्त्वेन सञ्जय़ ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
युधिष्ठिर उवाच
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व येषां स्पृहय़से नृप ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण तपोधन |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
जनमेजय़ उवाच
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महामुने ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
युधिष्ठिर उवाच
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व सर्वज्ञो ह्यसि मे मतः ||
५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
६
धृतराष्ट्र उवाच
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व साधु चेष्टामहे तथा |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४७
युधिष्ठिर उवाच
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व सूक्ष्मज्ञानं पितामह ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
एतन्मे स्नेहतः सर्वे वचनं कर्तुमर्हथ ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
एतन्मेध्यं पवित्रं च पावनं च न संशय़ः ||
१२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
एतन्मय़ा महाराज व्रह्मणो वदतः पुरा |
११२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
एतन्मय़ा श्रुतं तत्र धर्मसङ्करकारकम् |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
एतन्मय़ानुभूतं चिरजीविना दृष्टमिति पाण्डवानुवाच मार्कण्डेय़ः ||
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
भीष्म उवाच
एतन्मय़ाप्तं जनकात्पुरस्ता; त्तेनापि चाप्तं नृप याज्ञवल्क्यात् |
१०५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
एतन्मय़ोक्तं नरदेव तत्त्वं; नाराय़णो विश्वमिदं पुराणम् |
११० क
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
एतमर्थं च विज्ञाय़ श्रुत्वा च प्रभुमव्ययम् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
एतमर्थं महाराज पृष्टः पार्थेन नारदः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
एतमर्थं महावाहुरुभय़ोः स न्यवेदय़त् |
८० क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
एतमर्थं महावाहो नारदो वेद तत्त्वतः ||
२९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
धृतराष्ट्र उवाच
एतमर्थं महावुद्धे यत्त्वय़ा नाववोधितः ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
एतमर्थमभिज्ञाय़ देवराजः शतक्रतुः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
एतमर्थमहं ज्ञात्वा ततो गर्जामि गौतम ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
एतमश्वमपाने धमस्वेति ||
१५६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
एतमस्योरसि त्वं तु स्थापय़स्व पितुः प्रभो |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१२१
लोमश उवाच
एतमासाद्य कौन्तेय़ सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
एतमिच्छाम्यहं कामं त्वत्तो लोकपितामह |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
एतमेवार्थमाश्रित्य भूय़ो वक्ष्यामि पाण्डव ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
एतमेवार्थमाश्रित्य युद्धे देवासुरेऽव्रवीत् |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९२
अग्निरु उवाच
एतस्मात्कारणाच्चाग्नेः प्राक्तनं दीय़ते नृप ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
स्त्र्यु उवाच
एतस्मात्कारणाच्छक्र स्त्रीत्वमेव वृणोम्यहम् ||
४७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
भीष्म उवाच
एतस्मात्कारणाच्छ्रेय़ः कलिलं प्रतिभाति माम् |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
एतस्मात्कारणात्पाप जीवितं ते न विद्यते |
६७ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
एतस्मात्कारणात्पार्थ हरिश्चन्द्रो विराजते |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
एतस्मात्कारणात्प्रज्ञां मृगय़न्ते पृथग्विधाम् |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
एतस्मात्कारणादाहुरग्निं सर्वास्तु देवताः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
एतस्मात्कारणादेतद्दुःखं भूय़ोऽनुवर्तते ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
एतस्मात्कारणाद्घोरो वर्तते स्म जनक्षय़ः |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
एतस्मात्कारणाद्देवाः प्रजापालान्प्रचक्रिरे ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
एतस्मात्कारणाद्धात्रा कुसीदं सम्प्रवर्तितम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वासुदेव उवाच
एतस्मात्कारणाद्भीष्म मतिर्दिव्या मय़ा हि ते |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
एतस्मात्कारणाद्यज्ञैर्यजेद्राजाप्तदक्षिणैः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
एतस्मात्कारणाद्राजन्नागमं नागसाह्वय़म् |
४१ क