कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
एकैकं पञ्चभिर्वाणैः सहदेवो न्यकृन्तत ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
एकैकं पञ्चभिर्वाणैर्यमदण्डोपमैः शितैः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
एकैकं पञ्चभिर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध सप्तभिः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
एकैकं पञ्चभिर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध सप्तभिः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
एकैकं पञ्चभिर्विद्ध्वा भीमं विव्याध सप्तभिः |
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
एकैकं पञ्चभिर्विद्ध्वा युधिष्ठिरमपीडय़त् ||
६० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
एकैकं पञ्चभिर्विद्ध्वा शरैः संनतपर्वभिः |
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
एकैकं पञ्चविंशत्या दर्शय़न्पाणिलाघवम् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
एकैकं पञ्चविंशत्या साय़कानां समार्पय़त् ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
एकैकं योजनशतं विस्ताराय़ामसंमितम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
एकैकं वै काञ्चनं शृङ्गमेभ्यः; पत्नीश्चैषामददं निष्ककण्ठीः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
गौतम उवाच
एकैकं वै त्रिवार्षीय़ं तेन पीवाञ्शुनःसखः ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
एकैकं समरे दृष्ट्वा पाण्डवं पर्यपृच्छत ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
एकैकं हृदि चाजघ्ने एकैकेन महाय़शाः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०७
वैशम्पाय़न उवाच
एकैकः प्रसवस्तस्माद्भवत्यस्मिन्कुले सदा ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
एकैकमनुरक्तं च चक्रवाकसमं विभो ||
९ ग
वन पर्व
अध्याय
२८१
सत्यवानु उवाच
एकैकमस्यां वेलाय़ां पृच्छत्याश्रमवासिनम् ||
९१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
एकैकमात्मनः कर्म तुलय़ित्वाश्रमे पुरा |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
एकैकमेते राजेन्द्र मनुष्यान्पर्युपासते |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
एकैकमेष दशभिर्विभेद समरे शरैः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
एकैकमेषां निष्पिंषञ्शिष्टेषु निपुणं चरेत् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
एकैकमेषामनुय़ान्ति तत्र; रथाश्च यानानि च दन्तिनश्च ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
एकैकशः समर्था हि यूय़ं सर्वे महारथाः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
एकैकशः समर्थाः स्मो विजेतुं सर्वपार्थिवान् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
वृषादर्भिरु उवाच
एकैकशः सवृषाः सम्प्रसूताः; सर्वेषां वै शीघ्रगाः श्वेतलोमाः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
एकैकशश्च तान्पुत्रान्क्रोशमानान्वपद्यत ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
एकैकशश्च तान्विप्रान्निवेद्य वृषपर्वणे |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
वैशम्पाय़न उवाच
एकैकशश्चौघवलानिमान्पुरुषसत्तमान् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
एकैकशस्ततः कन्यास्तान्हंसान्समुपाद्रवन् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
एकैकशस्ते सङ्ग्रामे हन्युः सर्वान्महीक्षितः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
एकैकशो निहताः सर्व एव; योगैस्तैस्तैस्त्वद्धितार्थं मय़ैव ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
द्रोण उवाच
एकैकशो निय़ोक्ष्यामि तथा कुरुत पुत्रकाः ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४८
युधिष्ठिर उवाच
एकैकशो भीमवला नागाय़ुतवलास्तथा |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
एकैकश्च तदा योधः पञ्चभिः सप्तभिर्वृतः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
१४८
व्राह्मण उवाच
एकैकश्चैव पुरुषस्तत्प्रय़च्छति भोजनम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१९३
दुर्योधन उवाच
एकैकस्तत्र कौन्तेय़स्ततः कृष्णा विरज्यताम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
एकैकस्तु ततः पार्थं राजन्विव्याध पञ्चभिः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
एकैकस्ते तदा पाशः क्रमशः प्रतिमोक्ष्यते ||
११४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
एकैकस्त्रिभिरानर्छत्पुत्रं तव विशां पते ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
एकैकस्मिंस्तदा यज्ञे परिपूर्णानि भागशः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
एकैकस्मिन्क्रतौ तेन फलेनाहं न चागतः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्राह्मण उवाच
एकैकस्य गुणान्सम्यक्पञ्चानामपि मे वद ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
एकैकस्य नृपस्याङ्के पुत्रमारोपय़त्तदा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
एकैकस्य प्रभा तादृक्साभवन्मानवस्य ह ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
एकैकस्यां सहस्रं तु तनय़ानामभूत्तदा ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
एकैकस्येह विज्ञानं नास्त्यात्मनि तथा परे ||
९९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
एकैकस्येह सुभगे किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ||
५९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
दुर्योधन उवाच
एकैकेन च मां यूय़मासीदत युधिष्ठिर |
४९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
एकैकेन तु मां यूय़ं योधय़ध्वं युधिष्ठिर |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
एकैकेन यथा तेषां भूमिपाला वशीकृताः ||
१० ख