chevron_left  उपस्थितान्सहामात्योarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय ९७
लोमश उवाच
उपस्थितान्सहामात्यो विषय़ान्तेऽभ्यपूजय़त् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१४
भीष्म उवाच
उपस्थिताश्चाप्सरोभिः परिय़ान्ति दिवौकसः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
उपस्थिते विवाहे तु दाने यज्ञेऽपि वाभिभो |
७१ क
स्त्री पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
उपस्थितेऽस्मिन्सङ्ग्रामे ज्ञातीनां सङ्क्षय़े विभो |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
उपस्थितैस्ततो युद्धे राक्षसैर्युद्धदुर्मदैः |
७८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
उपस्थितो विनाशाय़ यतस्व पुरुषो भव ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
उपस्थोदरय़ोर्वेगो मृत्युवेगश्च दारुणः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
उपस्थोऽध्यात्ममित्याहुर्यथाय़ोगनिदर्शनम् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
उपस्पर्शनषड्भागं लभते पुरुषः सदा ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
उपस्पर्शनसक्तस्य स्वाध्याय़निरतस्य च |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
उमो उवाच
उपस्पर्शनहेतोस्त्वा समीपस्था उपासते ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
उपस्पृशेदुद्धृताभिरद्भिश्च पुरुषः सदा ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
गालव उवाच
उपस्पृश्य गृहीत्वेध्मं कुशांश्च शरणाद्गुरून् |
४३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
उपस्पृश्य च तत्रापि विधिवन्मुसलाय़ुधः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
उपस्पृश्य च तत्रैव प्रहृष्टो मुसलाय़ुधः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
उपस्पृश्य च विद्यानां सर्वासां पारगो भवेत् ||
४७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
उपस्पृश्य ततः कृष्णो व्रह्मास्त्रं सञ्जहार तत् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
उपस्पृश्य ततः क्रुद्धस्तपस्वी सुमहाय़शाः |
४३ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
उपस्पृश्य तपोदेषु काक्षीवानिव मोदते ||
८९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
उपस्पृश्य तु तत्रापि विधिवद्यदुनन्दनः |
५६ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
उपस्पृश्य नरो विद्वान्भवेन्नास्त्यत्र संशय़ः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
भीष्म उवाच
उपस्पृश्य फलं किं स्यात्तेषु तीर्थेषु वै मुने |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
उपस्पृश्य महाराज दुःखाद्वचनमव्रवीत् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १२१
लोमश उवाच
उपस्पृश्य महीपाल धूतपाप्मा भविष्यसि ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
उपस्पृश्य यथान्याय़ं पूजय़ित्वा तथा द्विजान् ||
९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
उपस्पृश्य यथान्याय़ं सन्ध्यामन्वासत प्रभो ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा कथय़ामास धीमतः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा सोऽव्रवीत्पावकं ततः |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
उपस्पृश्याभवत्तूष्णीं प्राय़ोपेतो महामतिः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय ११४
युधिष्ठिर उवाच
उपस्पृश्यैव भगवन्नस्यां नद्यां तपोधन |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
उपस्पृष्टं भवेत्तेन सर्वतीर्थेषु भारत |
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय ६६
शकुन्तलो उवाच
उपस्प्रष्टुं गतश्चाहमपश्यं शय़ितामिमाम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
शक्र उवाच
उपहन्यात्स मे द्विष्यात्तथा शृण्वन्तु मे वचः ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
उपहस्तावहस्ताभ्यां तेषां गात्राण्यकृन्तत ||
४१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
उपहारं महामन्युरथात्मानमुपाहरत् ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
उपहारः पुरा दत्तो व्रह्मरूप उपस्थिते ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
उपहारप्रिय़ः शर्वः कनकः काञ्चनः स्थिरः |
९० क
वन पर्व
अध्याय २०४
मार्कण्डेय़ उवाच
उपहारानाहरन्तो देवतानां यथा द्विजाः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
उपहृत्य प्रिय़ं तस्मै तस्मात्पापात्प्रमुच्यते ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
उपह्वरे निवसतो यस्याङ्के निषसाद ह |
६१ क
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
उपाकरोदस्त्रहेतोर्भारद्वाजः प्रतापवान् ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
उपाकुरुष्व तद्राजंस्तस्मान्मुच्यस्व सङ्कटात् ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
उत्तङ्क उवाच
उपाकृत्य गुरोरर्थं त्वदाय़त्तमरिन्दम |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
उपाकृत्य तु विप्राय़ वरं दुःखान्वितोऽभवत् ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
उपाकृत्य तु वै विद्यामाचार्येभ्यो नरर्षभाः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८
शल्य उवाच
उपाख्यानमिदं शक्रविजय़ं वेदसंमितम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
उपाख्यानैर्विना तावद्भारतं प्रोच्यते वुधैः ||
६१ ख
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
उपागमंस्ततो देवाः सेन्द्राः सह महर्षिभिः ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय ४९
दुर्योधन उवाच
उपागृह्णाद्यमिन्द्राय़ पुराकल्पे प्रजापतिः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
उपाघ्राति च यो गन्धान्रसांश्चापि पृथग्विधान् |
४९ क