वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
उपवासतपःशीला भर्तृदर्शनलालसा |
५८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
उपवासतपःशीला सदा स्वस्त्ययने रता ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
उपवासतपःशीलाः प्रतीता व्रह्मवादिनः ||
३५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
उपवासपरिश्रान्तं त्वगस्थिपरिवारितम् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
उपवासपरिश्रान्ता त्वं हि वान्धवनन्दिनी ||
४९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
उपवासपरिश्रान्तो यदा त्वमपि कर्शितः ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
उपवासमिमं कृत्वा गच्छेच्च परमां गतिम् |
१३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
उपवासरतिर्धीमान्सदा जप्यपराय़णः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
वैशम्पाय़न उवाच
उपवासविधिं पुण्यमाचष्ट भरतर्षभ ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
उपवासविधिस्त्वेष विस्तरेण प्रकीर्तितः |
१३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
वैशम्पाय़न उवाच
उपवासविधौ श्रेष्ठा ये गुणा भरतर्षभ ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
उपवासविशुद्धात्मा सततं सत्पथे स्थितः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
उपवासव्रतैर्दान्ता अहिंस्राः सत्यवादिनः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२८०
सावित्र्यु उवाच
उपवासान्न मे ग्लानिर्नास्ति चापि परिश्रमः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
युधिष्ठिर उवाच
उपवासे कथं तेषां कृत्यमस्ति पितामह ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
युधिष्ठिर उवाच
उपवासे मतिरिय़ं कारणं च न विद्महे ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
उपवासैः पूजय़न्ती पितॄन्देवांश्च सा पुरा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
उपवासैः प्रतप्तानां दीर्घं सुखमनन्तकम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
उपवासैर्वहुविधैश्चरिष्ये पारलौकिकम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११८
नारद उवाच
उपवासैश्च विविधैर्दीक्षाभिर्निय़मैस्तथा |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
उपवासैस्तथा तुल्यं तपःकर्म न विद्यते ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
उपवासैस्तथेज्याभिर्व्रतकौतुकमङ्गलैः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धय़े ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
उपविष्टं ततः स्कन्दं हिरण्यकवचस्रजम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
उपविष्टं ततो गर्भं कथय़न्ति मनीषिणः ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
उपविष्टं महाराज पूर्णेन्दुसदृशाननम् |
८३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
उपविष्टः कथाः शुभ्राः शुश्राव यदुपुङ्गवः ||
१४ ग
वन पर्व
अध्याय
२७८
मार्कण्डेय़ उवाच
उपविष्टः सभामध्ये कथाय़ोगेन भारत ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
उपविष्टस्य पृष्ठं ते पाणिना परिमार्जतु ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
उपविष्टा मन्दराग्रे सर्वे वृत्रवधेप्सवः ||
५२ ग
आदि पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
उपविष्टां च ददृशे देवय़ानीं शुचिस्मिताम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
उपविष्टाः कथाश्चक्रुर्दुःखशोकपराय़णाः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
उपविष्टाः शय़ानाश्च घ्नन्ति जीवाननेकशः |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
उपविष्टाभवद्देवी सोच्छ्वासं पुत्रमीक्षती ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
उपविष्टेषु सर्वेषु पाण्डवेषु महात्मसु ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
उपविष्टेषूपविष्टः शौनकोऽथाव्रवीदिदम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
उपविष्टो महर्षीणामुत्तरीय़ेषु भारत ||
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
उपविष्टो महाराज पूज्यमानः समन्ततः ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
७२
दमय़न्त्यु उवाच
उपविष्टो रथोपस्थे विकृतो ह्रस्ववाहुकः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
उपवीज्यमानो मिश्रेण वाय़ुना पुण्यगन्धिना ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
उपवेश्य महात्मानं कृष्णां च द्रुपदात्मजाम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
उपशमरुचिरात्मवान्प्रशान्तो; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
उपशाम्यद्रजो भौमं रुधिरेण प्रसर्पता |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
उपशाम्यद्रजो भौमं सर्वं व्याप्तं मरीचिभिः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
उपशिक्षन्महास्त्राणि ससंहाराणि पाण्डवः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
उपशिक्षाम ते वृत्तं सदैव न च शक्नुमः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
उपशुष्कजलस्थाय़ा विनिवृत्तसभाप्रपा |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४
उपश्रुतिरु उवाच
उपश्रुतिरहं देवि तवान्तिकमुपागता |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
उपश्रुत्य वचो राज्ञः स दूतान्प्राहिणोत्तदा ||
४० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
उपसंवेशय़न्राजंस्ततस्तां द्रुपदात्मजाम् |
२ ख