अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
उत्थाय़ सलिलात्तस्माद्रुदती शोकलालसा ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
उत्थाय़ाचम्य तिष्ठेत पूर्वां सन्ध्यां कृताञ्जलिः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१७२
वैशम्पाय़न उवाच
उत्थाय़ावश्यकार्याणि कृतवान्भ्रतृभिः सह ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
उत्थाय़ावश्यकार्यार्थं यय़ौ स्नानगृहं ततः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
उत्थाय़ोत्क्षिप्य तौ दम्यौ प्रससार महाजवः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
उत्थाय़ोत्थाय़ गच्छेच्च नित्ययुक्तो रिपोर्गृहान् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
उत्थाय़ोत्थाय़ यत्कार्यमस्य राज्ञः पितुर्मम |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
उत्थाय़ोत्थाय़ वै प्रादात्सहस्रं परिवत्सरान् ||
१०८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
उत्थाय़ोत्थाय़ हि यथा देहिनामिन्द्रिय़ैर्विभो ||
३५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
उत्थाय़ोत्थाय़ हि सदा प्रष्टव्या वृद्धसंमताः |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५३
नारद उवाच
उत्थितः प्राग्घ्रदाद्वीरः प्रगृह्य महतीं गदाम् ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
उत्थितस्तु जलात्तस्मात्पुत्रो दुर्योधनस्तव |
४५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
उत्थितान्यगणेय़ानि कवन्धानि समन्ततः |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
उत्थितान्यगणेय़ानि कवन्धानि समन्ततः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
उत्थितान्यगणेय़ानि कवन्धानि समन्ततः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
उत्थितान्यगणेय़ानि कवन्धानि समन्ततः |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
उत्थिताय़ां पृथाय़ां तु सुभद्रा भ्रातरं तदा |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
उत्थिते पुरुषव्याघ्रे पुनर्लक्ष्मीवति प्रभो |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
उत्थितेषु महाराज पृथिव्यां सर्वराजसु |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
उत्थितो व्राह्मणो दीप्तः क्षय़ान्तकृदुदारधीः |
९२ क
आदि पर्व
अध्याय
२५
कश्यप उवाच
उत्थितोऽसौ महाकाय़ः कृत्स्नं सङ्क्षोभय़न्सरः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
उत्पतद्भिः पतद्भिश्च निपतद्भिश्च वानरैः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
उत्पतद्भिरिवाकाशं क्रमद्भिरिव सर्वतः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
उत्पतद्भिरिवाकाशं तैर्हय़ैरन्वय़ात्परान् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
उत्पतद्भिश्च तैस्तत्र समुद्धूतं महद्रजः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
उत्पतन्त इवाकाशं विवभुस्ते हय़ोत्तमाः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पतन्तं तु वेगेन जग्राहैनं मनस्विनम् |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पतन्तं तु वेगेन पुनः पुनररिन्दमः |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पतन्तं महाराज गगनादिव भास्करम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
उत्पतन्तः खगास्ते तु वाक्यमाहुस्तदा नलम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
उत्पतन्तः पतन्तश्च प्लवमानाश्च वानराः |
१२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
उत्पतन्तः परे भीताः केचित्तत्र तथाभ्रमन् |
८४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
उत्पतन्ति हि मे वाणा धनुः प्रस्फुरतीव मे |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पतिष्यन्निवाकाशमभिदुद्राव पाण्डवम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
उत्पतेत्सरुजाद्देशाद्व्याधिदुर्भिक्षपीडितात् |
८७ क
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
उत्पतेदपि चाकाशं निपतेच्च यथेच्छकम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
उत्पत्तिं दानवृत्तिं च शिल्पं सम्प्रेक्ष्य चासकृत् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
उत्पत्तिनिधनज्ञस्य किं कार्यमवशिष्यते ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
उत्पत्तिवृद्धिक्षय़संनिपातै; र्न युज्यतेऽसौ परमः शरीरी |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९६
मनुरु उवाच
उत्पत्तिवृद्धिव्ययतो यथा स इति गृह्यते |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
उत्पत्य च महावेगः कक्ष्यामभ्यहनत्कपिः |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
उत्पत्य च समेय़ाय़ विरूपाक्षं वकाधिपः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
उत्पत्य निपतन्त्यन्ये शरघातप्रपीडिताः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
उत्पत्य राक्षसस्तूर्णं जग्राह च ननाद च ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
उत्पत्य सहसा तस्थुरन्तरिक्षगमास्ततः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
उत्पत्योत्पत्य च प्राहुर्मुहूर्तमिति चेति च ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
उत्पत्स्यति रुरुर्नाम प्रमतेरात्मजः शुचिः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
४४
सूत उवाच
उत्पत्स्यति हि ते पुत्रो ज्वलनार्कसमद्युतिः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२९०
सूर्य उवाच
उत्पत्स्यति हि पुत्रस्ते यथासङ्कल्पमङ्गने ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
उत्पत्स्यते महावीर्यो महावुद्धिपराक्रमः ||
८९ ख