वन पर्व
अध्याय
१४१
भीम उवाच
इय़ं चापि महाभागा राजपुत्री यतव्रता |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
इय़ं तु नः प्रिय़ा भार्या प्राणेभ्योऽपि गरीय़सी |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं तु निष्टप्तसुवर्णगौरी; राज्ञो विराटस्य सुता सपुत्रा |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
इय़ं तुष्टिरिय़ं सिद्धिरिय़ं श्रुतिरिय़ं स्मृतिः |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
शक्र उवाच
इय़ं ते योनिरधमा शोचस्याहो न शोचसि ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं ते सपत्न्यनपत्या |
७० ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं त्वनेकवशगा वन्धकीति विनिश्चिता ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
इय़ं दिग्दय़िता राज्ञो वरुणस्य तु गोपतेः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
अलर्क उवाच
इय़ं निष्ठा वहुविधा प्रज्ञय़ा त्वध्यवस्यति |
२४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं पुनः पद्मदलाय़ताक्षी; मध्यं वय़ः किञ्चिदिव स्पृशन्ती |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
अर्जुन उवाच
इय़ं भूत्वा चैकवप्रा शुचिराकाशगा पुनः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
नारद उवाच
इय़ं भोगवती नाम पुरी वासुकिपालिता |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
इय़ं यथा कपोतेन सिद्धिः प्राप्ता नराधिप ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
युधिष्ठिर उवाच
इय़ं या राजसूय़स्य सम्राडर्हस्य सुक्रतोः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
९०
लोमश उवाच
इय़ं राजर्षिभिर्याता पुण्यकृद्भिर्युधिष्ठिर |
१० क
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
इय़ं वस्त्रावकर्तेन संवीता चारुहासिनी |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
इय़ं विप्रतिपत्तिस्ते यदा त्वं पिशिताशनः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०७
सुपर्ण उवाच
इय़ं विवस्वता पूर्वं श्रौतेन विधिना किल |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
व्रह्मो उवाच
इय़ं वृत्रादनुप्राप्ता पुरुहूतं महाभय़ा |
४९ क
वन पर्व
अध्याय
२८८
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं व्रह्मन्मम सुता वाला सुखविवर्धिता |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११३
नारद उवाच
इय़ं शुल्केन भार्यार्थे हर्यश्व प्रतिगृह्यताम् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
भीष्म उवाच
इय़ं शय़्या भगवतो यथाकाममिहोष्यताम् |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
५२
विदुर उवाच
इय़ं सभा त्वत्सभातुल्यरूपा; भ्रातॄणां ते पश्य तामेत्य पुत्र ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं सरस्वती तूर्णं मत्समीपं तपोधनम् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
इय़ं सा परमा काष्ठा इय़ं सा परमा कला |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
इय़ं सा परमा शान्तिरिय़ं सा निर्वृतिः परा |
५८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
इय़ं सा परमा सिद्धिरिय़ं सा परमा गतिः ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
इय़ं सा वुद्धिरन्येय़ं यय़ा याति परां गतिम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं सागरपर्यन्ता समापूर्यत मेदिनी ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११३
नारद उवाच
इय़ं सुरसुतप्रख्या सर्वधर्मोपचाय़िनी ||
११ ख
मौसल पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं स्त्री पुत्रकामस्य वभ्रोरमिततेजसः |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं स्वसा राजचमूपतेस्तु; प्रवृद्धनीलोत्पलदामवर्णा |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
अलर्क उवाच
इय़ं स्वादून्रसान्भुक्त्वा तानेव प्रतिगृध्यति |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं हि कन्या द्रुपदस्य राज्ञ; स्तवानुजाभ्यां मय़ि संनिसृष्टा |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
प्रजापतिरु उवाच
इय़ं हि मां सदा देवी भारार्ता समचोदय़त् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
इय़ं हि योनिः प्रथमा यां प्राप्य जगतीपते |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं हि वसुधा सर्वा क्षीणरत्ना कुरूद्वहाः |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
इय़ं हि वसुधा सर्वा प्रसादात्तव माधव |
४८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
इय़ं हि वसुसम्पूर्णा मही सागरमेखला |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
इय़मम्वेति विख्याता ज्येष्ठा काशिपतेः सुता |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
इय़मापत्समुत्पन्ना परचक्रभय़ं महत् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
इय़मापत्समुत्पन्ना सर्वेषां सलिलौकसाम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
इय़मिन्द्रादनुप्राप्ता व्रह्महत्या वराङ्गनाः |
४२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
कृप उवाच
इय़मेनं गदा शूरं न जहाति रणे रणे |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
इय़ेष गन्तुं यत्रास्तां वीरौ कृष्णधनञ्जय़ौ ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
इय़ेष जेतुं तं देशं पाकशासननन्दनः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
इय़ेष तं मुनिं हन्तुमकृतज्ञः श्वय़ोनिजः ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
इय़ेष निर्गन्तुमथो वनाय़; तं वासुदेवः प्रणतोऽभ्युवाच ||
१०६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
इय़ेष पाण्डवस्तस्य वाणैश्छेत्तुं शरासनम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
इय़ेष फाल्गुनेः काय़ाच्छिरो हर्तुं सकुण्डलम् ||
२१ ख