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भीष्म पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
इह युद्धे महाराज भविष्यति महान्क्षय़ः |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय ५२
कुरुरु उवाच
इह ये पुरुषाः क्षेत्रे मरिष्यन्ति शतक्रतो |
६ क
वन पर्व
अध्याय १३०
लोमश उवाच
इह ये वै मरिष्यन्ति ते वै स्वर्गजितो नराः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७५
अकृतव्रण उवाच
इह रामः प्रभाते श्वो भवितेति मतिर्मम |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
इह लोके परे चैव किं भूय़ः कथय़ामि ते ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
इह लोके यशः प्राप्य शान्तपाप्मा प्रमोदते ||
६३ ख
वन पर्व
अध्याय २८४
कर्ण उवाच
इह लोके विशुद्धा च कीर्तिराय़ुर्विवर्धनी ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
इह लोके सुखं प्राप्य ते यान्ति परमां गतिम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
इह लोके हि धनिनः परोऽपि स्वजनाय़ते |
८६ क
सभा पर्व
अध्याय ६९
विदुर उवाच
इह वत्स्यति कल्याणी सत्कृता मम वेश्मनि |
६ क
वन पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
इह वा कृतमन्वेति परदेहेऽथ वा पुनः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
इह वा तारय़ेद्दुर्गादुत वा प्रेत्य तारय़ेत् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
इह वा प्रेत्य वा राजंस्त्वय़ा प्राप्तं यथातथम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १५०
कुन्त्यु उवाच
इह विप्रस्य भवने वय़ं पुत्र सुखोषिताः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
इह वेदाः प्रतिष्ठेरन्नेष नः काङ्क्षितो वरः ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
इह वैकस्य नामुत्र अमुत्रैकस्य नो इह |
३४ क
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
इह वैश्रवणस्तात पर्वसन्धिषु दृश्यते ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
इह श्रमो भय़ं मोहः क्षुधा तीव्रा च जाय़ते |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
इह संमानमृच्छन्ति परत्र च शुभां गतिम् ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
इह सर्वमनुक्रान्तमुक्तं ग्रन्थस्य लक्षणम् ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय १२९
लोमश उवाच
इह सारस्वतैर्यज्ञैरिष्टवन्तः सुरर्षय़ः |
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
ऋषय़ ऊचुः
इह ह्येतदुपादत्तं प्रेत्य स्यात्कटुकोदय़म् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
इहत्यास्तत्र जाय़न्ते ये वै पुण्यकृतो जनाः ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४७
व्रह्मो उवाच
इहलोकस्थ एवैष व्रह्मभूय़ाय़ कल्पते ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
इहलोके च स प्राणी जन्मप्रभृति पार्थिव |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
भीष्म उवाच
इहलोके यशः प्राप्य प्रेत्य स्वर्गमवाप्स्यसि ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
भीष्म उवाच
इहलोकेऽर्थवान्नित्यं व्रह्मलोके च मोदते ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
इहस्थं मां सभार्यस्त्वं द्रष्टासि श्वो नराधिप ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
इहस्थः पाण्डवश्रेष्ठं पश्यामि श्वेतवाहनम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
इहस्थश्च कुरुश्रेष्ठ न निवेद्योऽस्मि कस्यचित् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
इहस्थैरेव तत्सर्वं श्रोतव्यं भरतर्षभाः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
इहागतं द्विजश्रेष्ठं हनिष्यामि न संशय़ः ||
११ ग
आदि पर्व
अध्याय १९३
दुर्योधन उवाच
इहागतेषु पार्थेषु निदेशवशवर्तिषु |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
इहागतो जटिलो व्रह्मचारी; न वै ह्रस्वो नातिदीर्घो मनस्वी |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
इहागम्य तु याचित्वा न गृह्णीषे पुनः कथम् ||
७४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
इहागम्य हि मां राजञ्जाप्यं फलमय़ाचिथाः |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
इहाग्निसूर्यवाय़वः शरीरमाश्रितास्त्रय़ः |
५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
इहादित्याश्च रुद्राश्च वसवश्च महर्षिभिः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
विरूप उवाच
इहाद्य वै गृहीत्वा तत्प्रय़च्छे द्विगुणं फलम् |
९५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११८
कीट उवाच
इहापि विषय़ः सर्वो यथादेहं प्रवर्तितः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १०९
लोमश उवाच
इहाप्लुतानां कौन्तेय़ सद्यः पाप्मा विहन्यते |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
इहास्ति नौ विवादोऽय़मय़ं राजानुशासकः ||
८४ ख
वन पर्व
अध्याय २०५
व्राह्मण उवाच
इहाहमागतो दिष्ट्या दिष्ट्या मे सङ्गतं त्वय़ा |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
इहाहमिच्छामि तवानघान्तिके; वस्तुं यथा कामचरस्तथा विभो |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
इहेदानीं ततो रामः कर्मणो विरराम ह ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४४
व्राह्मण उवाच
इहेमां रजनीं साधो निवसस्व मय़ा सह |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
श्रीभगवानु उवाच
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ६०
दुर्योधन उवाच
इहैत्य कृष्णा पाञ्चाली प्रश्नमेतं प्रभाषताम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
इहैव गतमोहेन चरता मुक्तसङ्गिना ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
इहैव चैनं भोक्ष्यामि शुभाशुभफलोदय़म् ||
३३ ख