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शान्ति पर्व
अध्याय १५०
भीष्म उवाच
इदं च रमणीय़ं ते प्रतिभाति वनस्पते |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
इदं च राज्यं नः पार्था यच्चान्यद्वसु किञ्चन |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
इदं च रूपं प्रथमं च ते वय़ो; निरर्थकं केवलमद्य भामिनि |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
इदं च श्रूय़ते पार्थ युद्धे देवासुरे पुरा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
इदं च शय़नं दृष्ट्वा यच्चासीत्ते पुरातनम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
इदं च सप्तमं जन्म पद्मजं मेऽमितप्रभ ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय १०१
देवा ऊचुः
इदं च समनुप्राप्तं लोकानां भय़मुत्तमम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय ४६
धृतराष्ट्र उवाच
इदं च सुमहच्चित्रमर्जुनस्येह सञ्जय़ |
३९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
इदं च सुमहद्भूतं दैवदण्डमिवोद्यतम् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
इदं चतुर्दशं वर्षं यन्नापश्यं युधिष्ठिरम् |
७० क
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
इदं चाकीर्तिजं कर्म नृशंसैः पाण्डवैः कृतम् |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
इदं चाद्भुतमत्यर्थं कृतमस्मत्प्रिय़ेप्सय़ा ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय ४५
दुर्योधन उवाच
इदं चाद्भुतमत्रासीत्तन्मे निगदतः शृणु ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
इदं चान्यच्चित्रमाश्चर्यरूपं; चकारासौ कर्म शत्रुक्षय़ाय़ |
५९ क
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
इदं चान्यत्प्रीतिपूर्वं नरेन्द्र; ददामि ते वरमत्यद्भुतं च |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
अर्जुन उवाच
इदं चापरमत्रैव शृणु हृत्स्थं विवक्षितम् ||
६० ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
इदं चापि शरीरं मे तवाय़त्तं जनाधिप |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १५८
युधिष्ठिर उवाच
इदं चाश्चर्यभूतं मे यत्क्रोधात्तस्य धीमतः |
५० क
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
इदं चासीत्तत्र पूर्वं सर्पसत्रे भविष्यति |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
इदं चास्येदृशं कर्म वाल्लभ्येन तु रक्ष्यते |
५२ क
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
इदं चित्रमिदं घोरमिदं रौद्रमिति प्रभो |
३७ क
वन पर्व
अध्याय ७६
नल उवाच
इदं चैव हय़ज्ञानं त्वदीय़ं मय़ि तिष्ठति |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
इदं चैवापरं देवि व्रह्मणा समुदीरितम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
इदं चैवापरं प्राह देवी तत्प्रिय़काम्यया |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
इदं चैवापरं भूय़ः सह भ्रातृभिरच्युत |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
इदं छिद्रमिति ज्ञात्वा धरणीस्थं धनञ्जय़म् ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
इदं जप्यमिदं ज्ञानं रहस्यमिदमुत्तमम् |
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
इदं जितमिदं लव्धमिति श्रुत्वा पराजितान् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
इदं ज्ञात्वान्तकालेऽपि गच्छेद्धि परमां गतिम् ||
१८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
इदं तत्समनुप्राप्तं क्षत्तुर्वचनमुत्तमम् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
इदं तत्समनुप्राप्तं वर्षपूगाभिचिन्तितम् |
४ क
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
इदं तत्समनुप्राप्तं विदुरस्य वचो महत् |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११९
कीट उवाच
इदं तदतुलं स्थानमीप्सितं दशभिर्गुणैः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
इदं तदशुभं नूनं तस्य कर्म चिकीर्षितम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
भीष्म उवाच
इदं तदास्पदं कृत्स्नं यस्मिँल्लोकाः प्रतिष्ठिताः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
इदं तदिति वाक्यान्ते प्रोच्यते स विनिर्णय़ः ||
८४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
इदं तदित्यमन्यन्त दैवेनोपनिपीडिताः ||
६९ ख
विराट पर्व
अध्याय ११
विराट उवाच
इदं तवेष्टं यदि वै सुरोपम; व्रवीहि यत्ते प्रसमीक्षितं वसु |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
इदं तु खलु कौन्तेय़ श्रुतमासीत्पुरा मय़ा |
३६ क
विराट पर्व
अध्याय ४०
उत्तर उवाच
इदं तु चिन्तय़न्नेव परिमुह्यामि केवलम् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय १०
विराट उवाच
इदं तु ते कर्म समं न मे मतं; समुद्रनेमिं पृथिवीं त्वमर्हसि ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूय़वे |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
इदं तु त्रिषु लोकेषु महज्ज्ञानं प्रतिष्ठितम् |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय ५२
विदुर उवाच
इदं तु त्वां कुरुराजोऽभ्युवाच; पूर्वं पृष्ट्वा कुशलं चाव्ययं च |
७ क
विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
इदं तु दुःखं कौन्तेय़ ममासह्यं निवोध तत् ||
२१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
इदं तु दुःखं यच्छक्र कर्ताहमिति मन्यते ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
इदं तु दुष्करं कर्म कुटुम्वमभिसंश्रितम् |
५८ क
विराट पर्व
अध्याय ५५
अर्जुन उवाच
इदं तु दुष्करं मन्ये यदिदं ते चिकीर्षितम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
इदं तु दैवतं कृत्वा यथा यज्ञमवाप्नुय़ात् ||
३४ ग