शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
इत्येतैः पञ्चभिर्भूतैर्युक्तं स्थावरजङ्गमम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
इत्येतैरसुखैर्वाक्यैरय़ुक्तैरसमञ्जसैः |
७६ क
विराट पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
इत्येनां दक्षिणे पाणौ सूतपुत्रः परामृशत् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
इत्येभिः कारणैस्तस्य त्रिभिश्चित्तं प्रसिच्यते ||
१७ ग
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
इत्येव ते तद्वनमाविशन्तो; महत्यरण्ये मृगय़ां चरित्वा |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
इत्येव पृष्टः पुरुषोत्तमेन; सुदुःखितः केशवमाह वाक्यम् |
९० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
इत्येवं क्षत्रिय़ास्तत्र व्रुवन्त्यन्ये च भारत ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४१
भीष्म उवाच
इत्येवं खिद्यते नित्यं न च याति विनिश्चय़म् ||
७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
इत्येवं गर्हय़ित्वैषा तूष्णीमास्ते वराङ्गना |
२० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
इत्येवं गुरुभिः पूर्वमुपदिष्टं नृणां सदा ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
इत्येवं चिन्तय़न्कृत्स्नमहोरात्राणि भारत |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
इत्येवं चिन्तय़न्तस्ते रथेभ्योऽश्वान्विमुच्य ह |
६६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
इत्येवं चिन्तय़ानः स विदितश्च्यवनस्य वै |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
इत्येवं चिन्तय़ामास महर्षिरसितस्तदा |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
इत्येवं चिन्तय़ामास सुतस्नेहान्विता पृथा ||
३९ ख
विराट पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
इत्येवं चिन्तय़ित्वा सा भीमं वै मनसागमत् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
इत्येवं चोदितो देव्या तामवोचं सुमध्यमाम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१९
सूत उवाच
इत्येवं झषमकरोर्मिसङ्कुलं तं; गम्भीरं विकसितमम्वरप्रकाशम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५५
भीष्म उवाच
इत्येवं तपसा देवा महत्त्वं चाप्यवाप्नुवन् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
इत्येवं तर्जय़न्तौ तौ वाक्षल्यैस्तुदतां तथा ||
७० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
इत्येवं तव पुत्रस्य निशम्य करुणां गिरम् |
५७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
इत्येवं तेषु विप्रेषु चिन्तय़त्सु तथा तथा |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
इत्येवं त्रिषु वर्णेषु विवर्तन्ते गुणास्त्रय़ः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
इत्येवं धर्मतः ख्यातमृषिभिर्धर्मवादिभिः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
इत्येवं धर्ममालोक्य वेदवेदांश्च सर्वशः |
५३ क
आदि पर्व
अध्याय
१३१
वैशम्पाय़न उवाच
इत्येवं धृतराष्ट्रस्य वचनाच्चक्रिरे कथाः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
इत्येवं निश्चय़ं कृत्वा पाण्डवाः सहमाधवाः |
१०१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
इत्येवं निश्चय़ं चक्रे सुप्तानां युधि मारणे |
५३ क
वन पर्व
अध्याय
२८६
सूर्य उवाच
इत्येवं निय़मेन त्वं दद्याः शक्राय़ कुण्डले |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
६४
वृहदश्व उवाच
इत्येवं नैषधो राजा दमय़न्तीमनुस्मरन् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्येवं परिभर्त्सन्तीस्त्रास्यमाना पुनः पुनः |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
२४४
वैशम्पाय़न उवाच
इत्येवं प्रतिवुद्धः स रात्र्यन्ते राजसत्तमः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
इत्येवं भगवानत्रिः पितामहसुतोऽव्रवीत् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
इत्येवं भाषमाणस्य व्रह्मणो नृपसत्तम |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्येवं भ्रातरं दृष्ट्वा प्राप्तोऽसीति व्यगर्हय़त् ||
११ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
इत्येवं वदतस्तस्य जटी वीटामुखः कृशः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
इत्येवं वदतस्तस्य तदा दुर्वाससो मुनेः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्येवं वदता तस्य भुजो रामेण पातितः |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
इत्येवं वदतां तेषां नॄणां श्रुतिसुखा गिरः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
इत्येवं वदमानास्ते हर्षेण महता युताः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
इत्येवं वादिनौ हृष्टौ कृष्णौ श्वेतान्हय़ोत्तमान् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्येवं वानरेन्द्रास्ते समाजग्मुः सहस्रशः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
इत्येवं विंशतिश्चैव गुणाः सप्त च ये स्मृताः |
१११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
इत्येवं विविधा वाचस्तावकानां परैः सह ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
इत्येवं व्यक्तमाभाष्य प्रतिभाष्य च सात्यकिः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्येवं व्रुवतः श्रुत्वा रामस्य वरुणालय़ः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
इत्येवं व्रुवतस्तस्य सात्यकेरमितौजसः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्येवं व्रुवतस्तस्य स्रोतोभ्यस्तेजसोऽर्चिषः |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
इत्येवं व्रुवतो राजन्भारद्वाजस्य धीमतः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
इत्येवं स महातेजा दुःखितेभ्यो महाद्युतिः |
३५ क