द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा भरतश्रेष्ठ पुत्रो दुर्योधनस्तव |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा भरतश्रेष्ठः क्षत्रिय़ान्प्रतपञ्शरैः |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा भरतश्रेष्ठो गदामुद्यम्य वीर्यवान् |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा भरतश्रेष्ठो वृद्धः परममन्युमान् |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा भीमसेनस्तु कनिष्ठैर्भ्रातृभिर्वृतः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
इत्युक्त्वा भुजवीर्येण तस्मै प्राहिणवं रुषा ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा माधवं कर्णः परिष्वज्य च पीडितम् |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा मृदुसंहारं वृजिनाग्रं सुदर्शनम् |
३३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा रथमास्थाय़ प्राय़ादभिमुखः परान् |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा रथमास्थाय़ रौहिणेय़ः प्रतापवान् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वा राक्षसपतिः कुम्भकर्णं तरस्विनम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा राक्षसान्सर्वान्भीमसेनो व्यगाहत |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा राजशार्दूल गदामादाय़ वीर्यवान् |
२६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा राजशार्दूल द्रोणपुत्रः प्रतापवान् |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा राजशार्दूलस्तस्थौ गर्जन्नमर्षणः ||
४ ग
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा राजशार्दूला हृष्टाः परिघवाहवः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षं रक्षः क्रूरपराक्रमम् |
६४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षो राक्षसः परवीरहा |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षो राक्षसः सुमहावलः |
६३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा वचनं कुर्वन्वासुदेवस्य पाण्डवः |
६२ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वा वचनं मत्स्यः क्षणेनादर्शनं गतः |
५१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा वचनं राजञ्जय़ं प्राप्य वृकोदरः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
इत्युक्त्वा वरदः प्रादाद्वर्म तन्मन्त्रमेव च |
६३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा वरुणः प्रादाद्गदां मन्त्रपुरस्कृताम् |
४९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा वहु सान्त्वादि प्रसादमकरोज्जय़ः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वा वहुशो विद्वान्ग्रामं भैक्षाय़ संश्रितः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा वाष्पसन्नेन कण्ठेनाय़तलोचना |
४२ क
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा वासुदेवस्तु चिकीर्षन्सत्यमेव तत् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
भीष्म उवाच
इत्युक्त्वा विपुलं प्रीतो देवशर्मा महानृषिः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वा विससर्जैनं परिष्वज्य महेष्वरः |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा व्यथितो राजा नोवाच गतचेतनः |
६९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा व्राह्मणः साधुरुत्तरं पुनरुक्तवान् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा व्राह्मणान्सर्वानामन्त्रय़त पाण्डवः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
इत्युक्त्वा शरवर्षेण सर्वतः समवाकिरत् |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
३४
शिशुपाल उवाच
इत्युक्त्वा शिशुपालस्तानुत्थाय़ परमासनात् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
इत्युक्त्वा शुष्कपर्णैः स सम्प्रज्वाल्य हुताशनम् |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
इत्युक्त्वा स तदा तत्र विवर्णवदनोऽभवत् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
इत्युक्त्वा स तदा देवस्तत्रैवान्तरधीय़त |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
इत्युक्त्वा स तदा पुत्र तत्रैवान्तरधीय़त ||
४४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा स तदा राजा दुःखशोकसमाहतः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
इत्युक्त्वा स तदा वाक्यं मां पार्थ द्विजपुङ्गवः |
४९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा स तु तुष्टाव वचोभिर्वै महानदीम् |
१८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा स तु धर्मात्मा वृद्धो राजा कुरूद्वहः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा स निराक्रामद्भगवानृषिसत्तमः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा स नृपः शोचन्निषसाद महीतले |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा स महावाहुर्विजजृम्भे जिघांसय़ा |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा स महीं देवो व्रह्मा राजन्विसृज्य च |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
व्यास उवाच
इत्युक्त्वा स मुनिर्वाक्यं देवदूतं विसृज्य तम् |
४१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा सञ्जहारास्त्रं पुनरेव धनञ्जय़ः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा सञ्जय़ं भूय़ः पर्यपृच्छत भारत |
६६ क