आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
आक्रम्य मानुषं कण्ठमाच्छिद्य धमनीमपि |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
आक्रम्य मार्यमाणाश्च भ्राम्यन्ते वै पुनः पुनः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
आक्रम्य रत्नान्यहरत्कामरूपी विहङ्गमः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
आक्रम्य रोग आदत्ते पशून्पशुपचो यथा ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
आक्रम्य स कटीदेशे जानुना राक्षसाधमम् |
६४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
आक्रम्य स्यन्दनं पद्भ्यां वलेन वलिनां वरः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
आक्रम्याक्रम्य साधूनां दारांश्चैव धनानि च |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
आक्रान्त इन्धनैः स्थूलैस्तद्वद्योगोऽवलः प्रभो ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
आक्रामदूर्ध्वं मुदितो लेभे लोकांश्च पुष्कलान् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
आक्रामदूर्ध्वं वरदो वरार्हो; व्यावृत्य धर्मेण परेण रोदसी ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
आक्रीड इव रुद्रस्य घ्नतः कालात्यये पशून् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
आक्रीडं यक्षराजस्य कुवेरस्य महात्मनः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
आक्रीडदेको वलवान्पवनस्तोय़दानिव ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
आक्रीडन्तो वहन्ति स्म सारङ्गशवला हय़ाः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
आक्रीडभूतान्देवानां गन्धर्वाप्सरसां तथा ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
आक्रीडभूमिः सा राजंस्तासामप्सरसां शुभा |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
आक्रीडमानं कौन्तेय़ं हर्षेण महता युतम् ||
१८ ग
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
आक्रीडमानः कौन्तेय़ः श्रीमान्वाय़ुसुतो यय़ौ ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
आक्रीडा विविधा राजन्पद्मिन्यश्चामलोदकाः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२९
व्यास उवाच
आक्रीडानां गृहाणां च गदानामगदस्य च |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९८
नारद उवाच
आक्रीडान्पश्य दैत्यानां तथैव शय़नान्युत |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
आक्रीडावसथाः क्षिप्रं क्रिय़न्तामिति भारत ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१५२
राक्षसा ऊचुः
आक्रीडोऽय़ं कुवेरस्य दय़ितः पुरुषर्षभ |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
युधिष्ठिर उवाच
आक्रुश्यमानः सदसि कथं कुर्यादरिन्दम ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
आक्रुश्यमानो न वदामि किं चि; त्क्षमाम्यहं ताड्यमानश्च नित्यम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
आक्रुश्यमानो नाक्रोशेन्मन्युरेव तितिक्षतः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
८२
यय़ातिरु उवाच
आक्रुश्यमानो नाक्रोशेन्मन्युरेव तितिक्षतः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
हंस उवाच
आक्रुश्यमानो नाक्रोशेन्मन्युरेव तितिक्षितः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
आक्रुष्टः पुरुषः सर्वः प्रत्याक्रोशेदनन्तरम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
आक्रुष्टस्ताडितः क्रुद्धः क्षमते यो वलीय़सा |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
आक्रुष्टस्ताडितश्चैव मैत्रेण ध्याति नाशुभम् |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
आक्रोशं परिवादं च पैशुन्यं च विवर्जय़ेत् ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
आक्रोशतां हि भूतानां यः करोति हि निष्कृतिम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
आक्रोशनावमानाभ्यामवुधाद्वर्धते वुधः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३
युधिष्ठिर उवाच
आक्रोशन्त्यः कृशा दीना निपतन्त्यश्च भूतले ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
आक्रोशन्त्यः प्रनृत्यन्ति मन्दाः पर्वस्वसंय़ताः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
आक्रोशपरिवादाभ्यां विहिंसन्त्यवुधा वुधान् |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५८
भीष्म उवाच
आक्रोष्टा क्रुश्यते चैव वन्धिता वध्यते च यः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३७
भीष्म उवाच
आक्रोष्टा चातिवक्ता च व्राह्मणानां सदैव हि ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
आक्रोष्टा चाभिवक्ता च व्रह्मय़ज्ञेषु वै द्विजान् ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
आक्रोष्टाक्रुश्यते राजन्द्वेष्टा द्वेष्यत्वमाप्नुते ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
हंस उवाच
आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
८२
यय़ातिरु उवाच
आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
आक्रोष्टारश्च लुव्धाश्च हन्तारः साहसप्रिय़ाः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१५
सूत उवाच
आक्षिपन्तं प्रभां भानोः स्वशृङ्गैः काञ्चनोज्ज्वलैः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
५२
वृहदश्व उवाच
आक्षिपन्तीमिव च भाः शशिनः स्वेन तेजसा ||
१२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
आक्षिपन्त्यशिवा घोरा विनदन्तः पुनः पुनः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
आक्षिप्तसूत्रा मणय़श्छिन्नपक्षा इव द्विजाः |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
आक्षिप्य केशान्वेगेन वाह्वोर्जग्राह पाण्डवम् ||
४८ ख