अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
आत्मानं स्त्रीकृतं दृष्ट्वा व्रीडितो नृपसत्तमः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
स्त्र्यु उवाच
आत्मानं स्पर्शय़ाम्यद्य पाणिं गृह्णीष्व मे द्विज ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
आत्मानमनवज्ञाय़ जितवद्वर्ततां भवान् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
आत्मानमन्विच्छ गुहां प्रविष्टं; पितामहस्ते क्व गतः पिता च ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
आत्मानमन्विच्छ गुहां प्रविष्टं; पितामहास्ते क्व गताश्च सर्वे ||
७१ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
आत्मानमपि च क्रुद्धः प्रेषय़ेद्यमसादनम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
आत्मानमपि चोत्सृज्य तप्स्ये प्रेतवशं गतः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
आत्मानमर्जुनोऽपश्यद्गगने सहकेशवम् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मानमव्ययं चैव प्रकृतिं प्रभवं परम् |
८५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
आत्मानमसमाधाय़ समाधित्सति यः परान् |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
आत्मानमाख्याति हि कर्मभिर्नरः; स्वशीलचारित्रकृतैः शुभाशुभैः |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
भीष्म उवाच
आत्मानमाचचक्षे च च्यवनाय़ महात्मने ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
आत्मानमात्मना दण्डमसृजद्देवसत्तमः ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय
२
भीम उवाच
आत्मानमात्मना रक्षंश्चरिष्यामि विशां पते |
८ क
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
आत्मानमात्मना सत्यो जितस्वर्गा न संशय़ः |
८ ख
वन पर्व
अध्याय
७२
वृहदश्व उवाच
आत्मानमात्मना सत्यो जितस्वर्गा न संशय़ः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मानमात्मना हत्वा किं धर्मफलमाप्नुमः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
आत्मानमात्मना हन्ति पापो निकृतिजीवनः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
आत्मानमात्मनाश्वास्य हय़मेवान्वचिन्तय़त् ||
५ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
आत्मानमालोकय़ति मनसा प्रहसन्निव ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
आत्मानमुपजीवन्यो दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
आत्मानमुपजीवन्यो दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
आत्मानमुपजीवन्यो दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् |
५१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
आत्मानमुपजीवन्यो निय़तो निय़ताशनः |
४७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
व्रह्मो उवाच
आत्मानमुपसङ्गम्य सोऽमृतत्वाय़ कल्पते ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
आत्मानमेव गर्हेय़ं यदहं वः सुदुर्वलान् |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
आत्मानमेव जानाति निकृतं वान्धवैरपि |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
आत्मानमेव प्रथमं देशरूपेण यो जय़ेत् |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मानमेव प्रथमं देशरूपेण यो जय़ेत् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
आत्मानुगामिनां व्रह्म श्रावय़ामास भारत ||
१०७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मापराधात्पुत्रास्ते विनष्टाः पृथिवीपते |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
आत्मापराधात्सम्भूतं व्यसनं भरतर्षभ |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
धृतराष्ट्र उवाच
आत्मापराधात्सुमहन्नूनं तप्यति पुत्रकः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
आत्मापराधात्सुमहान्प्राप्तस्ते विपुलः क्षय़ः |
४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मापराधादाय़स्तस्तत्किं भीमं जिघांससि |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
आत्मापहारिणां या च या च मिथ्याभिशंसिनाम् ||
३१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
आत्मापि चाय़ं न मम सर्वा वा पृथिवी मम ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
व्राह्मण उवाच
आत्मापि चाय़ं न मम सर्वा वा पृथिवी मम |
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मापि चाय़ं न मम सर्वापि पृथिवी मम |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
आत्माभिप्रेतमुत्सृज्य कन्याभिप्रेत एव यः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
आत्मामात्यश्च कोशश्च दण्डो मित्राणि चैव हि ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
आत्मारामः प्रसन्नात्मा जडान्धवधिराकृतिः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
आत्मारामः प्रसन्नात्मा मिथिलामाससाद ह ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
आत्मारामेण वुद्धेन योक्तव्योऽऽत्मा न संशय़ः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
आत्मारामेण वुद्धेन वोद्धव्यं शुचिकर्मणा ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
आत्मार्थं च त्वदर्थं च श्रेय़ः साधारणं हि नौ ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
आत्मार्थं न प्रकर्तव्यं देवार्थं तु प्रकल्पय़ेत् ||
६५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२५
व्राह्मण उवाच
आत्मार्थं पाचय़न्नित्यं ममत्वेनोपहन्यते ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मार्थं युध्यमानानां विदिते कृत्यलक्षणे |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
आत्मार्थं युध्यमानास्ते समर्थाः पाण्डुनन्दनाः |
७ क