शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
अनन्यभक्तस्य सतस्तत्परस्य जितात्मनः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
अनन्यभक्ताः प्रिय़वादिनश्च; हिताश्च वश्याश्च तथैव राजन् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
अनन्यमनसा तेन कथं पित्रा विवर्जितः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
अनन्यमिदमैश्वर्यं लोके प्राप्तो युधिष्ठिरः |
४८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
अनन्यसदृशं लोके व्रतवन्तमकल्मषम् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
अनन्यस्त्रीजनः प्राज्ञो व्रह्मचारी तथा भवेत् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
अनन्या हि नरव्याघ्र नित्यदा धर्ममेव ते |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
२०६
उलूप्यु उवाच
अनन्यां नन्दय़स्वाद्य प्रदानेनात्मनो रहः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
अनन्याश्चिन्तय़न्तो मां ये जनाः पर्युपासते |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
अनन्येनैव योगेन मां ध्याय़न्त उपासते ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
अनपत्यः शुभाँल्लोकान्नावाप्स्यामीति चिन्तय़न् ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
अनपत्यतैकपुत्रत्वमित्याहुर्धर्मवादिनः ||
५९ ग
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
अनपत्यस्तु राजर्षिः स महात्मा दृढव्रतः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२९३
वैशम्पाय़न उवाच
अनपत्यस्य पुत्रोऽय़ं देवैर्दत्तो ध्रुवं मम |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
अनपत्योऽभवत्प्राणो दुर्धर्षः शत्रुतापनः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११६
नारद उवाच
अनपत्योऽसि राजर्षे पुत्रौ जनय़ पार्थिव |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
अनपाहतमेवेदं नेदं शास्त्रमपार्थकम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
अनपाय़ीनि सर्वाणि नित्यं राज्ञि युधिष्ठिरे ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः |
१६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
अनपेतानि वै शूराद्यथैवादौ प्रजापतेः ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
अनभिज्ञश्च दुःखानां विमानवरमास्थितः |
८९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४९
युधिष्ठिर उवाच
अनभिज्ञश्च साचिव्यं गमितः केन हेतुना |
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
अनभिज्ञेय़रूपां च प्रदग्धामस्त्रमाय़या ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
अनभिज्ञेय़रूपाणि द्वारकोपवनानि च |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३
भीष्म उवाच
अनभिध्या परस्वेषु सर्वसत्त्वेषु सौहृदम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
अनभिमतमसेवितं च मूढै; र्व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
अनभ्याहतचित्तः स्यादनभ्याहतवाक्तथा |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अनभ्रे च महाघोरं स्तनितं श्रूय़तेऽनिशम् |
३३ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
अनभ्रे प्रववर्ष द्यौः पपात ज्वलिताशनिः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
अनभ्रे प्रववर्ष द्यौर्मांसास्थिरुधिराण्युत |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
अनभ्रे विद्युतश्चासन्भूमिश्च समकम्पत ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
अनभ्रेऽशनिनिर्घोषः सविद्युत्समजाय़त |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
अनमित्रमथो ह्येतद्दुर्लभं सुलभं सताम् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
अनमित्रोऽथ निर्वन्धुरनपत्यश्च यः क्वचित् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
अनम्वूकृतमग्रस्तमनिरस्तमसङ्कुलम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
भीष्म उवाच
अनर्घेय़ा महाराज द्विजा वर्णमहत्तमाः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
अनर्जुनमिमं लोकं मुहूर्तमपि दारुक |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
अनर्जुना न शक्ष्यन्ति महीं भोक्तुं कथञ्चन ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
अनर्जुनाय़ां च भुवि मुहूर्तमपि मानद |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
अनर्थं संशय़ावस्थं वृण्वते मुक्तसंशय़ाः |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
अनर्थकं मे दर्शितवानसि त्वं; राज्यार्थिनो राज्यरूपं विनाशम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
अनर्थकं विप्रवासं गृहेभ्यः; पापैः सन्धिं परदाराभिमर्शम् |
८९ क
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
अनर्थकेषु को भावः पुरुषस्य विजानतः ||
३८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
अनर्थमर्थं मन्यसे राजपुत्र; सङ्ग्रन्थनं कलहस्यातिघोरम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
अनर्थमर्थं मन्वाना अर्थं वानर्थमात्मनः |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
अनर्थमर्थतः पश्यन्नर्थं चैवाप्यनर्थतः |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
अनर्थमिच्छन्ति नरेन्द्र पापा; ये धर्मनित्यस्य सतस्तवोग्राः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
अनर्थमिति मन्यन्ते सोऽय़मस्मासु वर्तते ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
अनर्थसंशय़ापन्नः श्रेय़ान्निःसंशय़ेन च ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
अनर्थस्य न कामोऽस्ति तथार्थोऽधर्मिणः कुतः |
२४ क