chevron_left  अधर्मविजय़ंarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
अधर्मविजय़ं लव्ध्वा कोऽनुमन्येत भूमिपः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
अधर्मविदुषो मूढा लोकशास्त्रविशारदाः |
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
अधर्मवुद्धे शृणु मे यत्त्वा वक्ष्यामि साम्प्रतम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
अधर्मवृत्ते नृपतौ सर्वे सीदन्ति पार्थिव ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
अधर्मव्रतसंय़ोगं यथाधर्मं युगे युगे |
६८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
अधर्मशव्दश्च महान्पृथिव्यां; नेदं कर्म त्वत्समं भारताग्र्य ||
१६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मश्च कृतोऽनेन धार्तराष्ट्रं जिघांसता |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मश्च परो राजन्पारुष्यं च निरर्थकम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मश्चानुवन्धोऽत्र घोरः प्राणहरो महान् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
अधर्मसङ्क्षय़े युक्तस्ततो जाय़ति मानुषः ||
७४ ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मस्तत्र सञ्जातः सर्वभूतविनाशनः ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
अधर्मस्ते न भविता तथा ध्यास्याम्यहं शुभे ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २०१
व्याध उवाच
अधर्मस्त्रिविधस्तस्य वर्धते रागदोषतः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६५
भीष्म उवाच
अधर्मस्त्रिविधस्तस्य वर्धते रागमोहजः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
अधर्मस्त्वेष राधेय़ यत्त्वं भीममवोचथाः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
अधर्मस्थे हि नृपतौ सर्वे सीदन्ति पार्थिव ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
अधर्मस्य क्षय़ं कृत्वा ततो जाय़ति मानुषः ||
७२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
अधर्मस्य क्षय़ं कृत्वा ततो जाय़ति मानुषः ||
९० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
युधिष्ठिर उवाच
अधर्मस्य गतिर्व्रह्मन्कथिता मे त्वय़ानघ |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
अधर्मस्यातिवादस्य वृद्धातिक्रमणस्य च ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
अधर्मा धर्मरूपेण तृणैः कूपा इवावृताः |
११ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
अधर्मा धर्मरूपेण तृणैः कूपा इवावृताः ||
५४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
अधर्माः सम्प्रवर्तन्ते प्रजासङ्करकारकाः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय ७७
शर्मिष्ठो उवाच
अधर्मात्त्राहि मां राजन्धर्मं च प्रतिपादय़ |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ७६
शुक्र उवाच
अधर्मात्त्वां विमुञ्चामि वरय़स्व यथेप्षितम् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय १८३
सनत्कुमार उवाच
अधर्मादृषय़ो भीता वलं क्षत्रे समादधन् ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अधर्माद्भीमसेनेन निहतोऽहं यथा रणे ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३०
व्यास उवाच
अधर्मान्तर्हिता वेदा वेदधर्मास्तथाश्रमाः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
युधिष्ठिर उवाच
अधर्मान्मुच्यते केन धर्ममाप्नोति वै कथम् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय़ः |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय १७२
गन्धर्व उवाच
अधर्मिष्ठं वरिष्ठः सन्कुरुषे त्वं पराशर |
१२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
अधर्मिष्ठानपि सतः कुन्तीपुत्रा महारथाः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अधर्मिष्ठैरुपाय़ैश्च प्रजा व्यवहरन्त्युत |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
युधिष्ठिर उवाच
अधर्मे धर्मतां नीते धर्मे चाधर्मतां गते ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
वासुदेव उवाच
अधर्मे वर्तमानानां सर्वेषामहमप्युत |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
अधर्मे वर्तमानानामर्थसिद्धिः प्रदृश्यते |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७
ऋषय़ ऊचुः
अधर्मे सम्प्रवृत्तस्त्वं धर्मं न प्रतिपद्यसे |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
अधर्मेण गदाय़ुद्धे यदहं विनिपातितः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मेण जिताञ्श्रुत्वा युष्मांस्त्यक्तघृणैः परैः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७६
अर्जुन उवाच
अधर्मेण जितान्दृष्ट्वा वने प्रव्रजितांस्तथा |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ७८
देवय़ान्यु उवाच
अधर्मेण जितो धर्मः प्रवृत्तमधरोत्तरम् |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अधर्मेण जय़ं लव्ध्वा को नु हृष्येत पण्डितः |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
अधर्मेण न गृह्णीय़ां त्वय़ा दत्तां महीमिमाम् |
५३ क
आदि पर्व
अध्याय ११३
पाण्डुरु उवाच
अधर्मेण न नो धर्मः संय़ुज्येत कथञ्चन |
४० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
अश्वत्थामो उवाच
अधर्मेण नरव्याघ्रो भीमसेनेन पातितः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय १९५
भीष्म उवाच
अधर्मेण निरस्ताश्च तुल्ये राज्ये विशेषतः ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अधर्मेण प्रवृत्तानां पाण्डवानामनेकशः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
अधर्मेण समाय़ुक्तो यमस्य विषय़ं गतः |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय ५९
धृतराष्ट्र उवाच
अधर्मेण हतं दृष्ट्वा राजानं माधवोत्तमः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
धृतराष्ट्र उवाच
अधर्मेण हतं श्रुत्वा धृष्टद्युम्नेन सञ्जय़ |
१ क