उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
अधनस्य मृतं श्रेय़ो न हि ज्ञातिक्षय़े जय़ः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०५
नारद उवाच
अधनस्याकृतार्थस्य त्यक्तस्य विविधैः फलैः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
अधनेनार्थकामेन नार्थः शक्यो विवित्सता |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
अधनो व्राह्मणः कश्चित्कामाद्धर्ममवैक्षत |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
अधनोऽस्मि द्विजश्रेष्ठ न च वेदविदप्यहम् |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
हंस उवाच
अधमांस्तु न सेवेत य इच्छेच्छ्रेय़ आत्मनः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
अधरोत्तरमेतद्धि यन्मा त्वं वक्तुमिच्छसि ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
अधरोत्तरमेतद्वा लोकानां वा पराभवः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
२९१
सूर्य उवाच
अधर्मं कुत एवाहं चरेय़ं लोककाम्यया ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
अधर्मं चरसे नूनं यो नावेक्षसि वै नय़म् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मं चाप्यकीर्तिं च लोके प्राप्स्यसि केवलम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
अधर्मं धर्मकामो हि करोतीहाविचक्षणः |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
अधर्मं धर्ममित्याहुर्ये च मोहवशं गताः |
६१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
अधर्मं नात्र पश्यन्ति धर्मतत्त्वार्थदर्शिनः ||
५३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
स्त्र्यु उवाच
अधर्मं प्राप्स्यसे विप्र यन्मां त्वं नाभिनन्दसि ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
अधर्मः क्षत्रिय़स्यैष यच्छय़्यामरणं भवेत् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
अधर्मः क्षत्रिय़स्यैष यद्व्याधिमरणं गृहे |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
अधर्मः प्रगृहीतः स्याद्यदि राजा न पालय़ेत् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
अधर्मः सततो धर्मं कालेन परिरक्षितम् ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
अधर्मः सुमहानेष यच्छय़्यामरणं गृहे ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
अधर्मः सुमहान्घोरो भविष्यति न संशय़ः ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
अधर्मकारी धर्मेण तपसा हन्ति किल्विषम् |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
२३१
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मचारिणस्तस्य कौरव्यस्य दुरात्मनः |
१९ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मज्ञस्य पापस्य पृथिवीसुहृदद्रुहः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
अधर्मज्ञस्य विलय़ं प्रजा गच्छन्त्यनिग्रहात् |
९५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
अधर्मज्ञा दुराचारास्ते भवन्ति गताय़ुषः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
अधर्मज्ञावलिप्ताश्च घोरा रौद्रप्रदर्शिनः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
अधर्मज्ञो नित्यवैरी पापवुद्धिर्नृशंसकृत् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
शल्य उवाच
अधर्मज्ञो महर्षीणां वाहनाच्च हतः शुभे ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
अधर्मज्ञोऽवलिप्तश्च वालवुद्धिरमर्षणः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
अधर्मतः कृतं युद्धं समय़ो निधनस्य ते ||
८९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
अधर्मतश्चोपय़ाता सा तानभ्यशपत्ततः ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
भीष्म उवाच
अधर्मतां याति धर्मो यात्यधर्मश्च धर्मताम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
अधर्मदर्शी यो राजा वलादेव प्रवर्तते |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
अधर्मनिरतान्मूढान्दग्धुमिच्छति ते सुतान् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२५
भीष्म उवाच
अधर्मनिरतो मूढो मिथ्या यो वै द्विजातिषु |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
अधर्मपादविद्धस्तु त्रिभिरंशैः प्रतिष्ठितः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अधर्मफलमत्यर्थं तदा भवति चानघ ||
४४ ग
आदि पर्व
अध्याय
७८
यय़ातिरु उवाच
अधर्मभय़संविग्नः शर्मिष्ठामुपजग्मिवान् ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्ममखिलं किं नु भीष्मोऽय़मनुमन्यते |
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
अधर्ममनृतं चैव दूरात्प्राज्ञो निवर्तय़ेत् ||
७५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४५
भीष्म उवाच
अधर्ममूलैर्हि धनैर्न तैरर्थोऽस्ति कश्चन ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
अधर्ममेतद्विपुलं धार्मिकः सन्न वुध्यसे |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मरुचय़ो मूढास्तिर्यग्गतिपराय़णाः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मरुचय़ो लुव्धाः सदा चाप्रिय़वादिनः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मरूपो धर्मो हि कश्चिदस्ति नराधिप |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
अधर्मलक्षणं चैव निय़तं पापकर्मसु ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मवहुला चैव घोरा पापानुवन्धिनी ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२९
भीष्म उवाच
अधर्मविजिगीषुश्चेद्वलवान्पापनिश्चय़ः |
५ क