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आदि पर्व
अध्याय १४१
वैशम्पाय़न उवाच
अद्य ते तलनिष्पिष्टं शिरो राक्षस दीर्यताम् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
अद्य ते दर्शय़िष्यामि पूर्वप्रेतान्पितामहान् ||
४७ ग
भीष्म पर्व
अध्याय १०५
सञ्जय़ उवाच
अद्य ते पुरुषव्याघ्र प्रतिमोक्ष्ये ऋणं महत् |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
अद्य ते विहनिष्यामि क्षुरेणोन्मथितं शिरः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
अद्य तेऽपचितिं कृत्वा शितैर्माधव साय़कैः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
अद्य तेऽहं रणे दर्पं सर्वं नाशय़िता नृप |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
अद्य तेऽहं विनेष्यामि युद्धश्रद्धां कुलाधम ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३२
दुर्योधन उवाच
अद्य तेऽहं विनेष्यामि युद्धश्रद्धां वृकोदर ||
४६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
अद्य तौ पुरुषव्याघ्रौ लोहिताक्षौ परन्तपौ |
५४ क
शल्य पर्व
अध्याय २८
युय़ुत्सुरु उवाच
अद्य त्वमिह विश्रान्तः श्वोऽभिगन्ता युधिष्ठिरम् ||
९१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
अद्य त्वा निहनिष्यामि सानुवन्धं सवान्धवम् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
अद्य त्वा पत्स्यते तद्वै यथा ह्यकुशलं तथा ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
अद्य त्वा योधय़िष्यामि रणे पुरुषसत्तम ||
४५ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
अद्य त्वां देवगन्धर्वा दिव्याश्चाप्सरसो दिवि |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
अद्य त्वां निहनिष्यामि यदि नोत्सृजसे रणम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १४१
वैशम्पाय़न उवाच
अद्य त्वां भगिनी पाप कृष्यमाणं मय़ा भुवि |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
अद्य त्वां समरे हत्वा नित्यं शूराभिमानिनम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३८
वासुदेव उवाच
अद्य त्वामभिषिञ्चन्तु चातुर्वैद्या द्विजातय़ः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
अर्जुन उवाच
अद्य त्वामहमेष्यामि कर्णं हत्वा महीपते |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
घटोत्कच उवाच
अद्य दास्यामि सङ्ग्रामं सूतपुत्राय़ तं निशि |
५८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अद्य दुःखमहं मोक्ष्ये त्रय़ोदशसमार्जितम् |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय ४३
कर्ण उवाच
अद्य दुर्योधनस्याहं शल्यं हृदि चिरस्थितम् |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
अद्य दुर्योधनाहं त्वां नन्दय़िष्ये सवान्धवम् |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
अद्य दुर्योधनो दीप्तां श्रिय़ं प्राणांश्च त्यक्ष्यति ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अद्य दुर्योधनो राजा जीविताच्च निराशकः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अद्य दुर्योधनो राजा पृथिवीमन्ववेक्षताम् |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अद्य दुर्योधनो हीनो दीप्तय़ा नृपतिश्रिय़ा ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अद्य दृष्ट्वा मय़ा कर्णं शरैर्विशकलीकृतम् |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
अद्य देवाः सम्प्रय़ाताः समैर्वर्त्मभिरस्थलैः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३४
अभिमन्युरु उवाच
अद्य द्रक्ष्यन्ति भूतानि द्विषत्सैन्यानि वै मय़ा ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सात्यकिरु उवाच
अद्य द्रक्ष्यन्ति मे वीर्यं कौरवाः ससुय़ोधनाः |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अद्य द्रष्टासि गोविन्द कर्णमुन्मथितं मय़ा |
८१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
अद्य द्रष्टासि तं वीरं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
अद्य द्रोणं रणे क्रुद्धः पातय़िष्यति पार्षतः |
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
अद्य धर्मसुतो राजा दृष्ट्वा मम पराक्रमम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
अद्य धर्मसुतो राजा श्रुत्वा त्वां निहतं मय़ा |
६ क
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
अद्य धर्मात्मता चैव व्यपकृष्टा युधिष्ठिरात् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
अद्य नाभ्येति मे कान्ता न कार्यं जीवितेन मे ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय २१२
वैशम्पाय़न उवाच
अद्य निष्कौरवामेकः करिष्यामि वसुन्धराम् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
अद्य पश्यत मे वीर्यं वाह्वोः पीनांसय़ोर्युधि |
५० क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
अद्य पश्यतु मे शल्य वाहुवीर्यं धनञ्जय़ः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४३
कुन्त्यु उवाच
अद्य पश्यन्तु कुरवः कर्णार्जुनसमागमम् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ६
शल्य उवाच
अद्य पश्यन्तु मां लोका विचरन्तमभीतवत् |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय ६
शल्य उवाच
अद्य पश्यन्तु मे पार्थाः सिद्धाश्च सह चारणैः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
अद्य पश्यन्तु मे वीर्यं पाण्डवाः सजनार्दनाः |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अद्य पश्यन्तु सङ्ग्रामे धनञ्जय़ममर्षणम् |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
अद्य पश्यन्तु सङ्ग्रामे धनञ्जय़ममर्षणम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
अद्य पश्यामि पृथिवीं शून्यामिव हतत्विषम् |
१४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
अद्य पाञ्चालपाण्डूनां शय़ितानात्मजान्निशि |
३४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
अद्य पाञ्चालराजस्य धृष्टद्युम्नस्य वै निशि |
३३ क