आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
संस्वेदाः कृमय़ः प्रोक्ता जन्तवश्च तथाविधाः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
संहता येन चाविद्धा भवन्ति नदतां नदाः |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
संहताः संहतैः केचित्परस्परजिघांसवः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
संहतानामनीकानां व्यूढानां भरतर्षभ |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
संहतानि च तूर्याणि तदा सर्वाण्यनेकशः ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
संहतान्योधय़ेदल्पान्कामं विस्तारय़ेद्वहून् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
संहतान्योधय़ेदल्पान्कामं विस्तारय़ेद्वहून् |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
संहताश्च भृशं ह्येते अन्योन्यस्य हितैषिणः ||
४३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
संहत्य कुर्वते यात्रां सहिताः सङ्घचारिणः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
संहत्य च भ्रुवोर्मध्यं न किञ्चिद्व्याजहार ह ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
संहत्य धर्मं चरतां पुरासीत्सुखमेव तत् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२७६
मार्कण्डेय़ उवाच
संहत्य निहतो वृत्रो मरुद्भिर्वज्रपाणिना |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
संहत्य भीमसेनाय़ व्याक्षिपत्सहसा करम् ||
९४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
संहत्यैतानि सर्वाणि यज्ञं निर्वर्तय़न्त्युत ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
उत्तङ्क उवाच
संहरस्व पुनर्देव रूपमक्षय़्यमुत्तमम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
संहरस्व पुनर्वाणमवध्योऽय़ं त्वय़ा रणे |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
संहरस्व महावीर्य स्वय़मात्मानमात्मना ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
संहरेत्क्रमशश्चैव स सम्यक्प्रशमिष्यति ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
संहरेद्वा जगत्कृत्स्नं विसृष्टं शूलपाणिना ||
१३२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
संहर्ता वृष्णिचक्रस्य नान्यो मद्विद्यते शुभे |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
५५
वृहदश्व उवाच
संहर्तुं नोत्सहे कोपं नले वत्स्यामि द्वापर ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
संहर्षात्प्रददौ वित्तं वहु राजा महामनाः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
संहर्षाद्धारय़न्क्रोधं धन्वी स्रग्वी रथे स्थितः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
संहर्षय़ति मां भूय़ः कुरूणां कीर्तिवर्धनः ||
५८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
संहर्षय़न्तः कौरव्यमक्षौहिण्या समाद्रवन् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१६
मार्कण्डेय़ उवाच
संहर्षय़न्देवसेनां जिघांसुः पावकात्मजम् ||
५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
संहारकारकश्चैव कारणं च विशां पते ||
८२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
संहारकाले परिदग्धकाय़ा; व्रह्माणमाय़ान्ति सदा प्रजा हि |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
प्रजापतिरु उवाच
संहारमासां वृद्धानां ततो मां क्रोध आविशत् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
संहारविक्षेपमनिष्टमेकं; चत्वारि चान्यानि वसत्यनीशः |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
संहारविक्षेपशतानि चाष्टौ; मर्त्येषु तिष्ठन्नमृतत्वमेति ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
संहारविक्षेपसहस्रकोटी; स्तिष्ठन्ति जीवाः प्रचरन्ति चान्ये |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
स्थाणुरु उवाच
संहारान्तं प्रसीदस्व मा क्रुधस्त्रिदशेश्वर |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
प्रजापतिरु उवाच
संहारार्थं महादेव भारेणाप्सु निमज्जति ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
संहारे सर्वतो जाते पृथिव्यां शोकसम्भवे |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
संहारो दुष्करस्तस्य देवैरपि हि संय़ुगे ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
संहितां जपता यावान्मय़ा कश्चिद्गुणः कृतः |
११२ क
आदि पर्व
अध्याय
१
ऋषय़ ऊचुः
संहितां श्रोतुमिच्छामो धर्म्यां पापभय़ापहाम् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
संहिताध्ययनं कुर्वन्वसन्गुरुकुले च यः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
संहिताध्ययने युक्तौ गोत्रतश्चापि काश्यपौ ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
संहिताध्याय़िना भाव्यं गृहे वै गृहमेधिना |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
संहितामीरय़न्ति स्म पदक्रमय़ुतां तु ते ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
संहितास्तैः पृथक्त्वेन भारतस्य प्रकाशिताः ||
७५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
संहृते परमास्त्रेऽस्मिन्सर्वानस्मानशेषतः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
संहृत्य तु ततो द्रोणः समवस्थाप्य चाहवे |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
संहृत्य माय़ां सहसा प्राविशन्पुरमात्मनः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२४
लोमश उवाच
संहृष्टः सेनय़ा सार्धमुपाय़ाद्भार्गवाश्रमम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
संहृष्टमनसोऽव्यग्रान्विधिवत्कल्पिते रथे ||
५६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
संहृष्टरोमा कौन्तेय़ विस्मय़ोत्फुल्ललोचनः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
संहृष्टरोमा दुर्धर्षः कृतं कार्यममन्यत |
८० क