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वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
अकार्षीः साहसमिदं कस्मात्प्राय़ोपवेशनम् |
२ क
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
अकार्षीद्वै दुष्कृतं नेह सन्ति; क्लीवाः पार्थाः पतय़ो याज्ञसेन्याः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
अकार्षुरपसव्यं च वहुशः पृतनां तव |
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय २०१
नारद उवाच
अकालकौमुदीं चैव चक्रतुः सार्वकामिकीम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय १५९
वैश्रवण उवाच
अकालज्ञः सुदुर्मेधाः कार्याणामविशेषवित् |
७ क
विराट पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
अकालज्ञासि सैरन्ध्रि शैलूषीव विधावसि |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
अकालमृत्युर्विश्वासो विश्वसन्हि विपद्यते |
११ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
अकालवर्षी च तदा भविष्यति सहस्रदृक् |
७६ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
अकालवर्षी पर्जन्यो भविष्यति गते युगे |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अकालविप्रमुक्तान्मे त्वत्त एव भय़ं भवेत् |
९० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
अकालिकं कुरवो नाभविष्य; न्पापेन चेत्पापमजातशत्रुः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अकाले कृत्यमारव्धं कर्तुं नार्थाय़ कल्पते |
८९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
अकाले पुरुषव्याघ्र संरम्भक्रिय़यानय़ा |
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
अकाले मन्त्रभेदाच्च येन माद्येन्न तत्पिवेत् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अकालेऽविषमस्थस्य स्वार्थहेतुरय़ं तव ||
१५२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
अकाष्ठमग्निं सा दृष्ट्वा स्वशरीरमथादहत् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२५
व्यास उवाच
अकाष्ठा निस्तृणा भूमिर्दृश्यते कूर्मपृष्ठवत् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११४
भीष्म उवाच
अकाय़श्चाल्पसारश्च वेतसः कूलजश्च वः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
अकिञ्चनः परिपतन्सुखमास्वादय़िष्यसि |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
अकिञ्चनः सुखं शेते समुत्तिष्ठति चैव हि ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
अकिञ्चनस्य शुद्धस्य उपपन्नस्य सर्वशः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
अकिञ्चनाश्च दृश्यन्ते पुरुषाश्चिरजीविनः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
कुशिक उवाच
अकिञ्चिदुक्त्वा गमनं वहिश्च मुनिपुङ्गव ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
अकिञ्चिदुक्त्वा तु गृहान्निश्चक्राम महातपाः ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
अकिञ्चिदुक्त्वा व्रीडितस्तत्रैवान्तरधीय़त ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
अकीर्तिं चापि भूतानि कथय़िष्यन्ति तेऽव्ययाम् |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
अकीर्तिं जनय़त्येव कीर्तिमन्तर्दधाति च ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
अकीर्तिं सर्वभूतेषु शाश्वतीं स निय़च्छति ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
अकीर्तिं सर्वलोकेषु गच्छेय़ं शाश्वतीः समाः ||
४१ ग
वन पर्व
अध्याय १९१
वैशम्पाय़न उवाच
अकीर्तिः कीर्त्यते यस्य लोके भूतस्य कस्यचित् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १००
भीष्म उवाच
अकीर्तिः शाश्वती चैव पतितव्यमनन्तरम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
अकीर्तिः स्याद्धृषीकेश मम पार्थस्य चोभय़ोः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २८४
कर्ण उवाच
अकीर्तिर्जीवितं हन्ति जीवतोऽपि शरीरिणः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
अकीर्त्यापि समाय़ुक्तो मृतो नरकमश्नुते ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
अकुतश्चित्कुतश्चिद्वा चित्ततः सात्त्विको गुणः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
अकुर्वञ्शान्तिमुद्विग्ना लोकानां लोकभावनाः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
अकुर्वतश्चेत्पुरुषस्य सञ्जय़; सिध्येत्सङ्कल्पो मनसा यं यमिच्छेत् |
२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
धृतराष्ट्र उवाच
अकुर्वता वचस्तेन मम पुत्रेण सञ्जय़ ||
१५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
धृतराष्ट्र उवाच
अकुर्वतां भोजकृपौ किं सञ्जय़ वदस्व मे ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
अकुर्वतोऽस्मद्वचनं स्यान्मृत्युरपि ते ध्रुवम् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
अकुर्वन्तो हि कर्माणि कुर्वन्तो निन्दितानि च |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
अकुर्वन्नार्यकर्माणि भैरवे सत्यभीतवत् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
अकुर्वन्वचनं तस्य नूनं शोचति मे सुतः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
अकुर्वन्विहितं कर्म प्रतिषिद्धानि चाचरन् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
अकुर्वाणं विकर्माणि शान्तं प्रज्ञानतर्पितम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
अकुर्वाणः परैः काञ्चित्संविदं जातु केनचित् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
अकुलीननराकीर्णो न राजा सुखमेधते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
अकुलीनस्तु पुरुषः प्रकृतः साधुसङ्क्षय़ात् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
उमो उवाच
अकुलीनास्तथा चान्ये कुलीनाश्च तथापरे ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
अकूजनेन चेन्मोक्षो नात्र कूजेत्कथञ्चन |
१४ क