आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अतः परं शान्तिपर्व द्वादशं वुद्धिवर्धनम् |
१९६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
अतः परं सुखं त्वन्यत्किं नु स्याद्भरतर्षभ ||
५८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
अतः परतरं नास्ति नाधरं न तिरोऽग्रतः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
अतः परमगम्योऽय़ं पर्वतः सुदुरारुहः |
७९ क
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
अतः परमहं धर्मं नान्यं पश्यामि कञ्चन ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
अतः पापमधर्मश्च तथा दुःखमनुत्तमम् |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
अतः पापीय़सी चैषां पाण्डवानामपीष्यते ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
युधिष्ठिर उवाच
अतः पुरःसराश्चापि निवर्तन्तु धनञ्जय़ ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
अतः प्रतिविशिष्टानि दुःखान्यन्यानि भारत |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
अतः प्रभृति सूर्यस्य तिर्यगावर्तते गतिः ||
१४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
अतः प्रवर्तते सर्वमस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितम् |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
अतः प्रसह्य हृतवान्कन्यां धर्मेण पाण्डवः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
वासुदेव उवाच
अतः प्रहर्षः सुमहान्युय़ुधानाद्य मेऽभवत् |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय
१५४
द्रोण उवाच
अतः प्रय़तितं राज्ये यज्ञसेन मय़ा तव |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
अतः प्रय़तितं राज्ये यज्ञसेन मय़ा तव ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
अतः स कामसंय़ुक्तो विमाने हेमसंनिभे |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
भीष्म उवाच
अतः सत्यं प्रशंसन्ति विप्राः सपितृदेवताः ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
अतः सत्यां प्रतिज्ञां तां पार्थेन परिरक्षता |
१०९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
अतः सम्भाव्यमेवैतद्यद्राज्यं प्राप्नुय़ादिति ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
अतः सूतं समाहूय़ दारुकं सन्दिदेश ह |
३९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
अतः सृष्टमिदं व्रह्मन्मय़ास्त्रमकृतात्मना |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
अतः सोमस्य हानिश्च वृद्धिश्चैव प्रदृश्यते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
अतः स्तैन्यं प्रभवति विकर्माणि च जाजले |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वासुदेव उवाच
अतः स्म सर्वे त्वय़ि संनिकर्षं; समागता धर्मविवेचनाय़ ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
अतऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि धूपदानविधौ फलम् |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
अतऊर्ध्वमरण्यं च सेवितव्यं नराधिप ||
१४४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
अतत्त्वं कुरुते तत्त्वं तेन मोहय़ते प्रजाः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
युधिष्ठिर उवाच
अतत्त्वज्ञस्य शास्त्राणां सततं संशय़ात्मनः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
अतत्त्वज्ञोऽसि वालश्च दुस्तोषोऽपूरणोऽनलः |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
अतत्त्वे तत्त्वदर्शी यस्तमसस्तत्त्वलक्षणम् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
अतथ्यविहितं यो वा नेदं वाक्यमुपाश्नुय़ात् ||
२३ ख
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
अतदर्हं महाप्राज्ञं जीवितार्थेऽभिसंश्रितम् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
अतदर्हा महात्मानः कथं केशव पाण्डवाः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
अतदर्हा महाभागा भगीरथसुता नदी |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
अतन्द्रितः कुरु क्षिप्रं मातापित्रोर्हि पूजनम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२०४
मार्कण्डेय़ उवाच
अतन्द्रितः सदा विप्र शुश्रूषां वै करोम्यहम् ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय
१४
भीम उवाच
अतन्द्रितस्तु प्राय़ेण दुर्वलो वलिनं रिपुम् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
अतन्द्रिता भारमिमं महान्तं; विभर्ति देवी पृथिवी वलेन |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
अतन्द्रिताः शीघ्रमपो वहन्ति; सन्तर्पय़न्त्यः सर्वभूतानि नद्यः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
अतन्द्रितो दहते जातवेदाः; समिध्यमानः कर्म कुर्वन्प्रजाभ्यः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
अतन्द्रितो वर्षति भूरितेजाः; संनादय़न्नन्तरिक्षं दिवं च |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
अतन्द्रितो व्रह्मचर्यं चचार; श्रेष्ठत्वमिच्छन्वलभिद्देवतानाम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
अतपास्तप आत्मानमगतिर्गतिमात्मनः ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
अतप्यत तपो घोरं हृष्टा धर्मपराय़णा |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
अतप्यत वचः स्मृत्वा नारदो यत्तदाव्रवीत् ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
अतर्पय़च्च कौन्तेय़ः खाण्डवे हव्यवाहनम् |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
अतर्पय़च्च विविधैर्वसुभिर्व्राह्मणांस्तथा |
५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
अतर्पय़त्ततः पार्थः शीतय़ा वारिधारय़ा |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
अतर्पय़त्सुदेवं च गोसहस्रेण पार्थिवः |
२५ क