chevron_left  अस्मत्पक्षोarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १९४
कर्ण उवाच
अस्मत्पक्षो महान्यावद्यावत्पाञ्चालको लघुः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
अस्मत्परोक्षं कर्माणि प्रवदन्ति कृतानि ते |
३८ क
वन पर्व
अध्याय २
व्राह्मणा ऊचुः
अस्मत्पोषणजा चिन्ता मा भूत्ते हृदि पार्थिव |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
अस्मत्प्रणेय़ो राजेति लोके चैव वदन्त्युत ||
५९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मत्प्रद्वेषसंय़ुक्तः पापवुद्धिः सदैव हि ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय १२०
सात्यकिरु उवाच
अस्मत्प्रमुक्तैर्विशिखैर्जितारि; स्ततो महीं भोक्ष्यति धर्मराजः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ९०
युधिष्ठिर उवाच
अस्मत्प्रिय़हितार्थाय़ पाञ्चाल्यो वः प्रदास्यति ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
अस्मत्प्रिय़हिते युक्ता भूय़ः पीडय़तीव माम् ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मत्प्रिय़ार्थं देवेश सदृशं दातुमर्हसि ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
अस्मत्संस्था च पृथिवी वर्तते भरतर्षभ |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मदन्यतमेनेह सज्जीभवतु को युधि ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
अस्मदर्थं च राजेन्द्र संनह्येद्यदि केशवः |
५८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २२
इन्द्रिय़ाण्यू ऊचुः
अस्मदर्थे कृते कार्ये दृश्यते प्राणधारणम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
अस्मदर्थे भवेद्वाय़मुपाय़श्चिन्तितो महान् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
अस्मदीय़ाश्च वहवः स्वर्गाय़ोपगता रणे |
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
अस्मदीय़ैश्च शोचद्भिर्नदद्भिश्च परैर्वृतम् |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मद्गमनसंय़ुक्तं वचो व्रूहि जनाधिपम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २३८
दुर्योधन उवाच
अस्मद्दुर्मन्त्रितं तस्मै वद्धांश्चास्मान्न्यवेदय़न् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७६
अर्जुन उवाच
अस्मद्धितमनुष्ठातुं न मन्ये तव दुष्करम् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मद्धितमिदं वाक्यं भीष्मः शान्तनवोऽव्रवीत् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
अस्मद्वंशकरः श्रीमांस्तव भ्राता च वंशकृत् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५६
वासुदेव उवाच
अस्मद्वधार्थं चिक्षेप गदां वै लोहितामुखीम् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८९
भीष्म उवाच
अस्मद्वधार्थं निश्चित्य तपो घोरं समास्थितः |
४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
अस्मद्वाक्यात्परिष्वज्य पृच्छेथास्त्वमनामय़म् ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२५
दुर्योधन उवाच
अस्मद्विजय़कामानां सुहृदामुपकारिणाम् |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
अस्मद्विधः प्रवर्तेत मा मा त्वमतिशङ्किथाः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय ३६
सूत उवाच
अस्मद्विधेषु सिद्धेषु व्रह्मवित्सु तपस्विषु ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय १३९
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मद्विषय़सुप्तेभ्यो नैतेभ्यो भय़मस्ति ते ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
अस्मन्मूर्तिश्चतुर्थी या सासृजच्छेषमव्ययम् |
६८ क
सभा पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
अस्मांस्तदेनो गच्छेत त्वय़ा वार्हद्रथे कृतम् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
अस्मांस्तु पुनरासाद्य लव्धलक्षा दुरासदाः |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
अस्मांस्तु पुनरासाद्य लव्धलक्षाः प्रहारिणः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय ३०
सूत उवाच
अस्मांस्ते हि प्रवाधेय़ुर्येभ्यो दद्याद्भवानिमम् ||
७ ग
वन पर्व
अध्याय ५१
वृहदश्व उवाच
अस्माकं कुरु साहाय़्यं दूतो भव नरोत्तम ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विरोचन उवाच
अस्माकं खल्विमे लोकाः के देवाः के द्विजातय़ः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
अस्माकं गमनं व्यक्तं वनं प्रति भवेत्पुनः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
अस्माकं च तथा सैन्यमल्पीय़ः सुतरां परैः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ३२
शेष उवाच
अस्माकं चापरो भ्राता वैनतेय़ः पितामह ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २१९
मातर ऊचुः
अस्माकं तद्भवेत्स्थानं तासां चैव न तद्भवेत् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
अस्माकं तपसा युक्तः पाहि राज्यं त्रिविष्टपे ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
अस्माकं तु परां पीडां चिकीर्षन्ति पुरे जनाः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निवोध द्विजोत्तम |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
अस्माकं तु विशिष्टा ये भीष्मद्रोणकृपादय़ः |
५९ क
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
अस्माकं त्वं पतिरिति व्रुवाणाः सर्वतोदिशम् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय २१४
शिवो उवाच
अस्माकं त्वं प्रिय़ो नित्यं विभीमस्तु वय़ं तव |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
अस्माकं त्वं वरं देव प्रय़च्छेमं पितामह |
१० क
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
अस्माकं दीर्घसूत्रः स्याद्भवान्धर्मपराय़णः ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय ५८
शकुनिरु उवाच
अस्माकं धनतां प्राप्तो भूय़स्त्वं केन दीव्यसि ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अस्माकं पण्डवानां च स्थितानां रणमूर्धनि ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
अस्माकं पाण्डवैः सार्धमनय़ात्तव भारत ||
५ ख