chevron_left  असिभिश्छिद्यमानानांarrow_drop_down
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
असिभिश्छिद्यमानानां शिरसां लोकसङ्क्षय़े |
६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
असिभ्यां चर्मणी शुभ्रे विपुले च शरावरे |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
असिमार्गान्वहुविधान्विचेरुस्तावका रणे |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
असिमुद्गरहस्ताश्च दण्डहस्ताश्च भारत ||
१०५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११९
सञ्जय़ उवाच
असिमुद्यम्य केशेषु प्रगृह्य च पदा हतः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
असिर्गदा धनुः शक्तिस्त्रिशूलं मुद्गरः शरः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
असिर्विशसनः खड्गस्तीक्ष्णवर्त्मा दुरासदः |
८२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
असिर्विशसनो धर्मस्तीक्ष्णवर्त्मा दुरासदः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
असिलोमा च केशी च दुर्जय़श्चैव दानवः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
असिवेगप्ररुग्णास्ते छिन्नवाहूरुवक्षसः |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
असिशक्तिगदापूर्णमप्लवं सलिलं यथा ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
असिशक्तिगदारुग्णा निपेतुर्धरणीतले ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
असिय़ुद्धे निय़ुद्धे च गदाय़ुद्धे च कोविदम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
असींश्च शक्तीश्च गदाश्च गुर्वीः; शङ्खं च जाम्वूनदचित्रभासम् ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २९
समुद्र उवाच
असीनादाय़ शक्तीश्च भार्गवं पर्यवारय़न् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
असुखानामनाथानां तिर्यग्योनिषु वर्तताम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
असुरपुरविदारणाः सुरा; ज्वलनसमिद्धवपुःप्रकाशिनः ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
असुरश्च महेष्वासो जम्भ इत्यभिविश्रुतः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
असुरसुरमनुष्याः पक्षिणो वोरगा वा; पितृरजनिचरा वा व्रह्मदेवर्षय़ो वा |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
असुरसुरमहोरगान्नरा; न्गरुडपिशाचसय़क्षराक्षसान् |
६५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
वसिष्ठ उवाच
असुरस्तारको नाम तेन सन्तापिता भृशम् ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
असुरस्तारको नाम त्वय़ा दत्तवरः प्रभो |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
असुरस्तारको नाम व्रह्मणो वरदर्पितः |
४८ क
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
असुरा जज्ञिरे क्षेत्रे राज्ञां मनुजपुङ्गव ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
असुरा भ्रातरो ज्येष्ठा देवाश्चापि यवीय़सः ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
असुरा यातुधानाश्च गुह्यकाश्च परन्तप |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९८
नारद उवाच
असुराः कालखञ्जाश्च तथा विष्णुपदोद्भवाः |
५ क
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
असुराञ्जनय़न्घोरान्मर्त्यांश्चैव पृथग्विधान् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
भीष्म उवाच
असुराणां तु सर्वेषां स्मृतिलोपोऽभवन्महान् |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
असुराणां नृपैतं वै धर्ममाहुर्मनीषिणः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
असुराणां पुराण्यासंस्त्रीणि वीर्यवतां दिवि |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
असुराणां पुराण्यासंस्त्रीणि वीर्यवतां दिवि |
५२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २६
व्राह्मण उवाच
असुराणां प्रवृत्तस्तु दम्भभावः स्वभावजः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
युधिष्ठिर उवाच
असुराणां प्रिय़करः सुराणामप्रिय़े रतः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
भीष्म उवाच
असुराणां प्रिय़करो निमित्ते करुणात्मके ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
असुराणां वधार्थाय़ सम्भवस्व महीतले ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७२
भीमसेन उवाच
असुराणां समृद्धानां ज्वलतामिव तेजसा |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १९२
मार्कण्डेय़ उवाच
असुराणां समृद्धानां विनाशश्च त्वय़ा कृतः ||
१७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
असुराणां सहस्राणि वहूनि सुरसत्तमः |
५७ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
असुराणां सुराणां च पुराणे संश्रुतो मय़ा ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
व्रह्मो उवाच
असुराणामभावाय़ देवगन्धर्वपूजितौ ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
असुराणामभावाय़ भावाय़ च दिवौकसाम् ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
असुराणामुपाध्याय़ः शुक्रस्त्वृषिसुतोऽभवत् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
असुरानिव देवेन्द्रो जय़ाशा मे त्वय़ि स्थिता ||
८७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
असुराश्च दुरात्मानस्ते चापि विवुधद्विषः |
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
असुराश्च सुराश्चैव पुण्यहेतोर्मखक्रिय़ाम् |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
व्यास उवाच
असुराश्चैव देवाश्च दक्षस्यासन्प्रजापतेः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
असुरास्तु निजघ्नुर्यान्सुरान्समरमूर्धनि |
८ क
वन पर्व
अध्याय २९
द्रौपद्यु उवाच
असुरेन्द्रं महाप्राज्ञं धर्माणामागतागमम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
असुरेन्द्रपुरे शुक्रं दृष्ट्वा वाक्यमुवाच ह ||
१६ ख