उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
अश्रद्दधत्परलोकाय़ मूढो; हित्वा देहं तप्यते प्रेत्य मन्दः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
अश्रद्दधान एवैको देवानां नार्हते हविः |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
अश्रद्दधानता चैव तामसं वृत्तमिष्यते ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
अश्रद्दधानभावाच्च विनाशमुपगच्छति ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
अश्रद्दधाना धर्मस्य ते नश्यन्ति न संशय़ः ||
४४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
अश्रद्दधानाय़ च यो व्रवीति; यश्चाकाम्यं कामय़ते नरेन्द्र ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
अश्रद्दधानैरप्राज्ञैः सूक्ष्मदर्शनवर्जितैः |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अश्रद्दधानो दुर्मेधा लुप्तस्मृतिरसि ध्रुवम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
अश्रद्धा परमं पापं श्रद्धा पापप्रमोचनी |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
अश्रद्धेय़ः कृतघ्नो हि कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०५
नारद उवाच
अश्रद्धेय़ः कृतघ्नो हि कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
अश्रद्धेय़तमं तेषां दर्शनं सा पुनः पुनः |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
अश्रद्धेय़महं मन्ये वधं कर्णस्य सञ्जय़ ||
३३ ख
मौसल पर्व
अध्याय
९
अर्जुन उवाच
अश्रद्धेय़महं मन्ये विनाशं शार्ङ्गधन्वनः |
१४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
अश्रद्धेय़मिदं कर्म कृतं भीमेन सञ्जय़ |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
दुःषन्त उवाच
अश्रद्धेय़मिदं वाक्यं कथय़न्ती न लज्जसे |
७६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
धृतराष्ट्र उवाच
अश्रद्धेय़मिवाश्चर्यं सौभद्रस्याथ विक्रमम् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
अश्रद्धय़ा हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
अश्राद्धेय़ानि धान्यानि कोद्रवाः पुलकास्तथा |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
अश्रान्तः स्यादनादानात्संमतो निरुपद्रवः |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
अश्रान्तां चाविवर्णां च क्षुत्पिपासासहां सतीम् ||
४६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
अश्रान्तैश्चापि लघुभिरध्वर्युवृषभैस्तथा ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
अश्रु दुःखाभिभूताय़ा मम मार्जस्व भारत |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
अश्रुकण्ठः सुदुःखार्तः प्राञ्जलिः प्रणिपत्य च |
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
अश्रुकण्ठा यथा दैत्या हिरण्याक्षे पुरा हते ||
७० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
अश्रुकण्ठा रुदन्तश्च सभाय़ामासते तदा ||
१८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
अश्रुकण्ठा विनिःश्वस्य रुदन्तमिदमव्रुवन् ||
२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
अश्रुकण्ठीः समारोप्य ततोऽसौ निर्ययौ पुरात् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
अश्रुकण्ठोऽभवद्राजा पर्यशोचत चात्मजम् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
सञ्जय़ उवाच
अश्रुक्लिन्नमुखो दीनो निरुत्साहो द्विषज्जय़े |
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
अश्रुतश्च समुन्नद्धो दरिद्रश्च महामनाः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
अश्रुतोऽस्य समुत्पन्नावश्विनौ रूपसंमतौ ||
१८ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अश्रुत्वा हितकामस्य विदुरस्य महात्मनः |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अश्रुत्वा ह्यस्य वीरस्य वाक्यानि मधुराण्यहम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१९०
द्रुपद उवाच
अश्रुत्वैवं वचनं ते महर्षे; मय़ा पूर्वं यतितं कार्यमेतत् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
अश्रुपातपरिक्लिन्नः पाणिस्पर्शनपीडितः |
६६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
अश्रुपूर्णमुखः कर्णः कश्मलं समपद्यत ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
अश्रुपूर्णमुखीं दीनां दुर्धर्षः स वृकोदरः ||
२६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
अश्रुपूर्णमुखो राजा निःश्वसंश्च पुनः पुनः |
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
अश्रुपूर्णे ततो नेत्रे अपमृज्य पुनः पुनः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
अश्रुपूर्णेक्षणा कृष्णा कृष्णं वचनमव्रवीत् ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
अश्रुपूर्णेक्षणा वाक्यमुवाचेदं मनस्विनी ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
अश्रुप्रपातनं चैव कर्तव्यं भूतिमिच्छता ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
अश्रुप्रमार्जनं तस्य कर्तव्यमिति निश्चितः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६
सूत उवाच
अश्रुविन्दूद्भवा तस्याः प्रावर्तत महानदी |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
अश्रूणि च व्यमुञ्चन्त वाहनानि विशां पते ||
३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
अश्रूणि मुमुचुर्नागा वेपथुश्चास्पृशद्भृशम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१०
सुरभिरु उवाच
अश्रूण्यावर्तय़न्ती च नेत्राभ्यां करुणाय़ती ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
अश्रूय़त धनुर्घोषो विस्फूर्जितमिवाशनेः ||
१८ ख