शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
अशोकं स्थानमातिष्ठेदिह चामुत्र चाभय़म् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
अशोकं स्थानमातिष्ठेन्निश्चलं प्रेत्य चेह च ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४
नारद उवाच
अशोकः शतधन्वा च भोजो वीरश्च नामतः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
८६
धौम्य उवाच
अशोकतीर्थं मर्त्येषु कौन्तेय़ वहुलाश्रमम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
अशोकवनिकाभ्याशे गृहं कृत्वा न्यवेशय़त् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
अशोकवनिकाभ्याशे तापसाश्रमसंनिभे ||
४१ ग
आदि पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
अशोकवनिकाभ्याशे शर्मिष्ठां प्राप्य विष्ठितः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
अशोकवनिकास्थां तां रामदर्शनलालसाम् |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
अशोकान्मुचुकुन्दांश्च फुल्लांश्चैवातिमुक्तकान् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
अशोके विमले तीर्थे स्नात्वा तर्प्य च देवताः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
अशोको नाम राजासीन्महावीर्यपराक्रमः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
भीष्म उवाच
अशोचता शत्रुमध्ये वुद्धिमास्थाय़ केवलाम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
अशोचत्तत्र वैदर्भी किं नु मे दुष्कृतं कृतम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
अशोचदमरप्रख्यो यथा कृत्वेह कर्म तत् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
अशोचन्नप्रहृष्यंश्च चरेद्विगतमत्सरः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
अशोचन्नप्रहृष्यंश्च नित्यं विगतमत्सरः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
अशोचन्नारभेतैव युक्तश्चाव्यसनी भवेत् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्याध उवाच
अशोचन्नारभेतैव युक्तश्चाव्यसनी भवेत् ||
२४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२
विदुर उवाच
अशोचन्प्रतिकुर्वीत यदि पश्येत्पराक्रमम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
अशोचन्प्रतिकुर्वीत यदि पश्येदुपक्रमम् ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
अशोच्यं तु कुतस्तेषां येषां वैरं भविष्यति |
४ क
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
अशोच्यं नु कुतस्तस्या यस्या भर्ता युधिष्ठिरः |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
६५
धृतराष्ट्र उवाच
अशोच्याः कुरवो राजन्येषां त्वमनुशासिता |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
अशोच्यास्ते महात्मानः क्षत्रिय़ाः क्षत्रिय़र्षभ |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
अशोच्यो हि हतः शूरः स्वर्गलोके महीय़ते ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
अशोभत च देवस्य माला गात्रे सितप्रभे |
१२० क
आदि पर्व
अध्याय
१६८
गन्धर्व उवाच
अशोभत तदा तेन शक्रेणेवामरावती ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
अशोभत तदा राजन्स देवोऽतीव भारत ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
अशोभत तदा वीरो भूय़ एव वृकोदरः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
अशोभत परं लक्ष्म्या पुष्पाढ्य इव किंशुकः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
अशोभत महादेवः पौर्णमास्यामिवोडुराट् ||
११० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
अशोभत महाराज किंशुकैरिव पुष्पितैः ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
अशोभत महाराज देवैरिव शतक्रतुः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
अशोभत महाराज सविद्युदिव तोय़दः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
अशोभत महाराज सशृङ्ग इव पर्वतः ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
अशोभत महाराजः सह पार्थैः श्रिय़ा वृतः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
अशोभत महावाहुर्गाण्डीवं विक्षिपन्धनुः |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
अशोभत महेष्वासो धृष्टद्युम्नः कृतव्रणः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
अशोभत मुखे तस्य भीमसेनो महावलः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
अशोभत यथा नारी करजक्षतविक्षता ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
अशोभत यथा मत्तैर्वनं प्रक्रीडितैर्गजैः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
अशोभत वनं तत्तैर्महेन्द्रध्वजसंनिभैः ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
अशोभत सदो राजन्कौन्तेय़स्य महात्मनः ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
अशोभत सरिच्छ्रेष्ठा दीप्यमानैः समन्ततः ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
अशोभत हतो वीरो व्याधैर्वनगजो यथा ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
अशोभन्त नरव्याघ्रा ग्रहा व्याप्ता घनैरिव ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
अशोभन्त महात्मानस्त्रय़स्त्रय़ इवाग्नय़ः ||
१४८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
अशोभन्त महाराज ग्रहास्तारागणैरिव ||
३० ख