chevron_left  अशिष्टाarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
अशिष्टा गतमर्यादा लोभेन हृतचेतसः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १७१
और्व उवाच
अशिष्टानां निय़न्ता हि शिष्टानां परिरक्षता |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
अशिष्टेभ्योऽसमर्थेभ्यो मूढेभ्यो भरतर्षभ ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
अशिष्यं शास्ति यो राजन्यश्च शून्यमुपासते |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
अशीतिभिस्त्रुटैर्हीनं तं मुहूर्तं प्रचक्षते ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
अशीतिर्धर्मकामास्त्वां क्षत्रिय़ाः पर्युपासते |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
अशीतिशतमष्टौ च नव चान्ये तपस्विनः ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
अशीतिशतवर्षेय़ं माता न इति वादिनः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
अशीते विद्यते शीतं शीते शीतं न विद्यते |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
अशीत्या कृतवर्माणं कृपं षष्ट्या शिलीमुखैः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
अशीत्या क्षत्रवर्माणं षड्विंशत्या सुदक्षिणम् |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
अशीत्या निशितैर्वाणैस्ततोऽक्रोशन्त तावकाः ||
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
अशीत्या भीमसेनश्च शरै राजानमार्दय़त् ||
१३ ग
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अशीत्या मार्गणैः क्रुद्धो वाह्वोरुरसि चार्दय़त् ||
६७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
अशीत्याशीविषप्रख्यैः सूतपुत्रमविध्यत ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
अशीलश्चापि पुरुषो भूत्वा भवति शीलवान् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
अशुक्लं चेतसः सौक्ष्म्यमव्यक्तं व्रह्मणोऽस्य वै ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
विश्वामित्र उवाच
अशुचिर्व्रह्मकूटोऽस्तु ऋद्ध्या चैवाप्यहङ्कृतः |
६८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
अङ्गिरा उवाच
अशुचिर्व्रह्मकूटोऽस्तु श्वानं च परिकर्षतु |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
अशुचींश्च यदा क्रुद्धः क्षिणोति शतशो नरान् |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
अशुचीन्यत्र पश्येत व्राह्मणान्वृत्तिकर्शितान् |
५१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
उमो उवाच
अशुचौ मांसकलिले वसाशोणितकर्दमे |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
अशुद्ध एव शुद्धात्मा तादृग्भवति पार्थिव |
१० क
सभा पर्व
अध्याय ४५
धृतराष्ट्र उवाच
अशुभं वा शुभं वापि हितं वा यदि वाहितम् |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
अशुभं वाक्यमादत्ते पुरीषमिव सूकरः ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
अशुभद्विट्शुभप्रेप्सुर्नित्ययज्ञः शुभव्रतः |
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
अशुभस्य चतुर्थांशस्त्रीनंशाननुवर्तते |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
अशुभस्य तदा अर्धं द्वावंशावनुवर्तते |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
अशुभस्याशुभं विद्याच्छुभस्य शुभमेव च ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
अशुभा गतय़ः प्राप्ताः कष्टा मे पापसेवनात् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २९७
भीष्म उवाच
अशुभेभ्यः समाक्षिप्य शुभेष्वेवावतारय़ेत् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
अशुभैः कर्मभिः पापास्तिर्यङ्नरकगामिनः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
अशुभैः कर्मभिश्चापि प्राय़शः परिचिह्निताः ||
१९ ग
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
अशुभैर्वा निरादानो लक्ष्यते ज्ञानदृष्टिभिः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
अशुभैश्चाप्यधोजन्म कर्मभिर्लभतेऽवशः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
अशुश्रुम भृशं चास्य शक्रस्येवाभिगर्जतः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
अशुश्रूषा त्वरा श्लाघा विद्याय़ाः शत्रवस्त्रय़ः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
अशुश्रूषुर्गुरोः शिष्यः कश्चिच्छिष्यसखो गुरुः ||
७१ ख
सभा पर्व
अध्याय १०
नारद उवाच
अशून्या रुचिरा भाति गन्धर्वाप्सरसां गणैः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
अशृणोत्परुषा वाचस्ततो दुःखतरं नु किम् ||
८५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
अशृणोत्सहसा पार्थः पाञ्चजन्यस्य निस्वनम् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
अशृण्वतः स्वनं तस्य का शान्तिर्हृदय़स्य मे ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
इन्द्र उवाच
अशृण्वानाः पुराणानां धर्माणां प्रवरा गतीः |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
अशेत निहतः पत्री चन्दनेष्वरिसूदनः ||
६६ ख
आदि पर्व
अध्याय १८४
वैशम्पाय़न उवाच
अशेत भूमौ सह पाण्डुपुत्रैः; पादोपधानेव कृता कुशेषु |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
अशेत मुसलेष्वेव प्रसादार्थं भवस्य सा ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७२
भीष्म उवाच
अशेषान्कल्पय़ेद्राजा योगक्षेमानतन्द्रितः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
अशेषेण हि गोविन्दे कीर्तय़िष्यामि तान्यहम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
अशोकं शोकनाशार्थं शास्त्रं शान्तिकरं शिवम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
अशोकं स्थानमातिष्ठ इह चामुत्र चाभय़म् ||
२० ख