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शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
अवश्यं तपसा तेषां फलितव्यं नृपोत्तम ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
अवश्यं तात यष्टव्यं त्रिभिर्वर्णैर्यथाविधि ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
महेश्वर उवाच
अवश्यं तु मय़ा कार्यं साह्यं सर्वदिवौकसाम् |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
अवश्यं तु मय़ा कार्यः सूतपुत्रस्य निग्रहः |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
अवश्यं तु मय़ा कार्यमात्मनः शोकनाशनम् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
अवश्यं तु मय़ा राजंस्तव वाच्यं हितं सदा |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
अवश्यं तु मय़ा वाच्यं यत्पथ्यं तव पाण्डव |
५७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
अवश्यं तु मय़ा वाच्यं येन हीनोऽस्मि फल्गुनात् ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
अवश्यं तु मय़ा वाच्यं वुध्यतां यदि ते हितम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
अवश्यं तु मय़ा सर्वं विज्ञाप्यस्त्वं नराधिप |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
अवश्यं तु युवानोऽस्य प्रमीय़न्ते नरा गृहे ||
१६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३८
कुन्त्यु उवाच
अवश्यं ते ग्रहीतव्यमिति मां सोऽव्रवीद्वचः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
अवश्यं तैर्निकर्तव्यमस्माकं तत्प्रिय़ैषिभिः ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
अवश्यं त्विह धीरेण सतां मध्ये विवक्षता |
११ क
विराट पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
अवश्यं त्वेव वासार्थं रमणीय़ं शिवं सुखम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
अवश्यं न भविष्यामः सर्वं च न भविष्यति ||
१९ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
अवश्यं नरकस्तात द्रष्टव्यः सर्वराजभिः ||
११ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
अवश्यं नरकस्तात द्रष्टव्यः सर्वराजभिः |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
अवश्यं निधनं सर्वैर्गन्तव्यमिह मानवैः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
अवश्यं प्रजहात्येतत्तद्विद्वान्कोऽनुसञ्ज्वरेत् ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
अवश्यं भगवन्तो मे माननीय़ास्तपस्विनः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४८
वासुदेव उवाच
अवश्यं भरणीय़ा हि पितुस्ते राजसत्तम ||
१६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अवश्यं भवितव्ये च कुरूणां वैशसे नृप |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ११६
कुन्त्यु उवाच
अवश्यं भाविनो भावान्मा मां माद्रि निवर्तय़ ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
धर्म उवाच
अवश्यं भोः शरीरं ते त्यक्तव्यं मुनिपुङ्गव |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
अवश्यं मरणे प्राप्ते करिष्याम्यस्य यन्मतम् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
अवश्यं मानना कार्या तवास्माभिर्यशस्विनि |
२३ क
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
अवश्यं राजपिण्डस्तैर्निर्वेश्य इति मे मतिः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९८
जमदग्निरु उवाच
अवश्यं विनय़ाधानं कार्यमद्य मय़ा तव ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
अवश्यं समरे द्रोणो धृष्टद्युम्नेन सङ्गतः |
५५ क
वन पर्व
अध्याय १९२
विष्णुरु उवाच
अवश्यं हि त्वय़ा व्रह्मन्मत्तो ग्राह्यो वरो द्विज ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
अवश्यं हि धनं देय़ं शूद्रापुत्राय़ भारत ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
उत्तङ्क उवाच
अवश्यकरणीय़ं वै यद्येतन्मन्यसे विभो |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
अवश्यकरणीय़ं हि गुरोरिह हि शासनम् |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
अवश्यकरणीय़ेऽर्थे मा त्वां कालोऽत्यगादय़म् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
अवश्यकार्य इत्येव शरीरस्य क्रिय़ास्तथा ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
अवश्यभरणीय़ो हि वर्णानां शूद्र उच्यते ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
अवश्यभाविन्यर्थे वै सन्तापो नेह विद्यते ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
कर्ण उवाच
अवश्यभावी वै योऽर्थो न स शक्यो निवर्तितुम् |
२४ क
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
अवश्यभावी सम्प्राप्तः स्वभावाल्लोमहर्षणः ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
अवश्यमेकं स्पृशतो दृष्टमेतदसंशय़म् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
अवश्यमेतत्कर्तव्यं राज्ञा वलवतापि हि |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
अवश्यमेतत्कर्तव्यममोघं दर्शनं मम ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
वैशम्पाय़न उवाच
अवश्यमेव तैः सर्वैर्वरदानेन दर्पितैः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय २३८
वैशम्पाय़न उवाच
अवश्यमेव नृपते राज्ञो विषय़वासिभिः |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
राजो उवाच
अवश्यमेव वक्तव्यं शृणुष्वैकमना द्विज ||
४७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १४
धृतराष्ट्र उवाच
अवश्यमेव वक्तव्यमिति कृत्वा व्रवीमि वः |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
अवश्यमेव सङ्ग्रामे क्षत्रिय़ेण विशेषतः |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
अवष्टभ्य धनुष्कोटिं रुरोध विवुधांस्ततः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
अवसं तत्र सुचिरं धनुर्वेदचिकीर्षय़ा ||
२५ ख