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शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थैरर्था निवध्यन्ते गजैरिव महागजाः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अर्थैरर्था निवध्यन्ते गजैर्वनगजा इव ||
१०४ ख
सभा पर्व
अध्याय ७
नारद उवाच
अर्थो धर्मश्च कामश्च विद्युतश्चापि पाण्डव ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
अर्थो धर्मश्च कामश्च हर्षो द्वेषस्तपो दमः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
अर्थो वा मित्रवर्गो वा ऐश्वर्यं वा कुलान्वितम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ||
५९ ख
आदि पर्व
अध्याय १५०
कुन्त्यु उवाच
अर्थौ द्वावपि निष्पन्नौ युधिष्ठिर भविष्यतः |
२० क
सभा पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थ्यं तथ्यं हितं वाक्यं लघु युक्तमनुत्तमम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
भीष्म उवाच
अर्थय़न्कलशं राजन्काञ्चनं वल्कलानि च |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
अर्थय़ुक्तानि चात्यर्थं कामान्सर्वांश्च सेवते ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अर्थय़ुक्तिं समालोक्य सुमहद्विन्दते फलम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अर्थय़ुक्तिमविज्ञाय़ चलितं तस्य जीवितम् ||
१३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अर्थय़ुक्तिमविज्ञाय़ यः शुभे कुरुते मतिम् |
१३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अर्थय़ुक्तिमिमां तावद्यथाभूतां निशामय़ |
५९ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
अर्थय़ुक्त्या प्रवत्स्यन्ति मित्रसम्वन्धिवान्धवाः |
७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अर्थय़ुक्त्या हि जाय़न्ते मित्राणि रिपवस्तथा ||
१३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अर्थय़ुक्त्या हि दृश्यन्ते पिता माता सुतास्तथा |
१३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
अर्थय़ेदेव मित्राणि सति वासति वा धने |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थय़ोगं दृढं कुर्याद्योगैरुच्चावचैरपि ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
अर्दितं शरजालेन मय़ा दृष्ट्वा पितामहम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
अर्द्यमानाः शरैरेते रुक्मपुङ्खैर्महात्मना |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२८
सञ्जय़ उवाच
अर्द्यमानाः शरैस्तूर्णं न्यपतन्पाण्डुसैनिकाः ||
१७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
अर्द्यमानाश्च विवुधा ग्रहेण सुवलीय़सा |
५५ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
अर्दय़ामास तां सेनां धर्मराजस्य पश्यतः ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्दय़ामास निशितैराशीविषविषोपमैः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
अर्दय़ामास राजेन्द्र सङ्क्रुद्धः शिनिपुङ्गवम् ||
३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
अर्दय़िष्यामि सङ्क्रुद्धो रणे पाण्डुसुतांस्तथा ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय ४३
कर्ण उवाच
अर्दय़िष्याम्यहं पार्थमुल्काभिरिव कुञ्जरम् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १८४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्धं च भीमाय़ ददाहि भद्रे; य एष मत्तर्षभतुल्यरूपः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
अर्धं च रात्र्याः स्वपतां दिवा चास्वपतां तथा ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
अर्धं ते भुञ्जते वीराः सह मात्रा परन्तपाः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
अर्धं त्यक्त्वा यदा राजा नीत्यर्धमनुवर्तते |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
अर्धं त्वमविचारेण फलं तस्य समाप्नुहि ||
४८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
अर्धं निहत्य सैन्यस्य कर्णो वैकर्तनो हतः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
अर्धं पापस्य हरति पुरुषस्येह कर्मणः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्धं प्रदाय़ पार्थेभ्यो महतीं श्रिय़माप्स्यसि ||
६० ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्धं भार्या मनुष्यस्य भार्या श्रेष्ठतमः सखा |
४० क
आदि पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
अर्धं भैक्षस्य सर्वस्य भीमो भुङ्क्ते महावलः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
अर्धं मम शरीरस्य सर्वलोकपितामहः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २३
धृतराष्ट्र उवाच
अर्धं मे केकय़ा लव्धाः काशिकाः कोसलाश्च ये |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १९९
धृतराष्ट्र उवाच
अर्धं राज्यस्य सम्प्राप्य खाण्डवप्रस्थमाविश ||
२५ ग
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
अर्धं राज्यस्य सम्प्राप्य खाण्डवप्रस्थमाविशन् ||
२६ ग
सभा पर्व
अध्याय ६१
कश्यप उवाच
अर्धं हरति वै श्रेष्ठः पादो भवति कर्तृषु |
७० क
उद्योग पर्व
अध्याय २
वलदेव उवाच
अर्धं हि राज्यस्य विसृज्य वीराः; कुन्तीसुतास्तस्य कृते यतन्ते |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
अर्धचन्द्रं च सन्धाय़ सुतीक्ष्णं लोमवाहिनम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४३
सञ्जय़ उवाच
अर्धचन्द्रेण चिच्छेद चापं रत्नविभूषितम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
अर्धचन्द्रेण चिच्छेद द्रोणस्य सशरं धनुः ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
अर्धचन्द्रेण चिच्छेद माधवस्य महद्धनुः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
अर्धचन्द्रेण चिच्छेद रथशक्त्या च सारथिम् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
अर्धचन्द्रेण चिच्छेद शिरस्तस्य महात्मनः ||
१६ ख