शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
अर्थाः प्रत्यवसीदन्ति तथानर्था भवन्ति च ||
२५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
अर्थाः समतिवर्तन्ते हंसाः शुष्कं सरो यथा ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थाच्च तात धर्माच्च तव वुद्धिरुपप्लुता ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
अर्थादाने महान्दोषः प्रदाने च महद्भय़म् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थादेतानि सर्वाणि प्रवर्तन्ते नराधिप ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
अर्थानर्थौ समौ यस्य तस्य नित्यं क्षमा हिता ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
अर्थानर्थौ सुखं दुःखं धर्माधर्मौ वलावले |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
अर्थानर्थौ सुखं दुःखं विधानमनुवर्तते ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अर्थानां चैव सर्वेषामनुशास्ता च मे भव ||
१२५ ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थानां तु पुनर्द्वैधे नित्यं भवति संशय़ः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
अर्थानामननुष्ठाता कामचारी विकत्थनः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
अर्थानामीश्वरो यः स्यादिन्द्रिय़ाणामनीश्वरः |
६१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
व्राह्मण उवाच
अर्थानिष्टान्कामय़ते स्वभावः; सर्वान्द्वेष्यान्प्रद्विषते स्वभावः |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
अर्थानुत्सृज्य दिग्वासा वनवासमरोचय़त् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
वसिष्ठ उवाच
अर्थान्काङ्क्षतु कीनाशाद्विसस्तैन्यं करोति यः ||
५८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
अर्थान्न मिथ्या पश्यन्ति तवामात्या हृता धनैः ||
९५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थान्न शोचन्प्राप्नोति न शोचन्विन्दते सुखम् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७१
भीष्म उवाच
अर्थान्व्रूय़ान्न चासत्सु गुणान्व्रूय़ान्न चात्मनः |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
अर्थान्समनुतिष्ठन्ति रक्षन्ति च परस्परम् ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
अर्थान्समीक्ष्यारभते स ध्रुवं महदश्नुते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
अर्थार्थं परिगृह्णीय़ात्कामक्रोधौ च वर्जय़ेत् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
अर्थार्थमनुसार्यन्ते सिद्धार्थस्तु विमुच्यते ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
अर्थार्थमन्यद्भवति विपरीतमथापरम् |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
अर्थार्थमभिगच्छन्ति तेभ्यो दत्तं महाफलम् ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थार्थिनः सन्ति केचिदपरे स्वर्गकाङ्क्षिणः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अर्थार्थी जीवलोकोऽय़ं न कश्चित्कस्यचित्प्रिय़ः ||
१४५ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थार्थी पुरुषो राजन्वृहन्तं धर्ममृच्छति |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
अर्थार्थी यदि वा वैरी स मृतो जाय़ते खरः ||
८६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
युधिष्ठिर उवाच
अर्थाश्रय़ाद्वा कामाद्वा वर्णानां वाप्यनिश्चय़ात् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
७८
वृहदश्व उवाच
अर्थास्तस्योपपत्स्यन्ते धन्यतां च गमिष्यति ||
१२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
अर्थाय़ैव हि केषाञ्चिद्धननाशो भवत्युत |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
अर्थिनः किञ्चिदिच्छन्ति तेषु दत्तं महाफलम् ||
५८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
अर्थिनश्च भवन्त्यर्थे तेषु दत्तं महाफलम् ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
अर्थिनश्चोपगच्छन्ति तेषु दत्तं महाफलम् ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
अर्थिनो भोक्तुमिच्छन्ति तेषु दत्तं महाफलम् ||
५२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
अर्थिप्रत्यर्थिनः प्राप्तानपास्यसि कथञ्चन ||
८१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
ऋषय़ ऊचुः
अर्थिभ्यो दीय़तां सर्वमित्युक्त्वा ते ततो यय़ुः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थी त्वय़ाहमिति ||
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
अर्थी भवन्तमुपगतोऽस्मीति ||
१०६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
अर्थे तु शक्यते भोक्तुं कृतकार्योऽवमन्यते |
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
अर्थे निविशमानस्य विषमिश्रं यथा मधु ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
अर्थे वा यदि वा धर्मे समर्थो देशकालवित् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थे सर्वे समारम्भाः समाय़त्ता न संशय़ः |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
अर्थे हि महती तृष्णा स च दुःखेन लभ्यते ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
अर्थेन तु महावाहुं वार्ष्णेय़ं त्वं जिहीर्षसि |
१० क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थेन तु समोऽनर्थो यत्र लभ्येत नोदय़ः |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थेन हि विहीनस्य पुरुषस्याल्पमेधसः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
अर्थेप्सुता परं दुःखमर्थप्राप्तौ ततोऽधिकम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्थेभ्यो हि विवृद्धेभ्यः सम्भृतेभ्यस्ततस्ततः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
अर्थेषु भागी पुरुष ईहमानः पुनः पुनः |
४ क