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भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
अमुच्यत महारौद्रात्तस्माद्वीरावकर्तनात् ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
अमुञ्चं वज्रसंस्पर्शानाय़सान्निशिताञ्शरान् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
अमुञ्चं समरे वाणं रामाय़ हृदय़च्छिदम् ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय ६७
शकुनिरु उवाच
अमुञ्चत्स्थविरो यद्वो धनं पूजितमेव तत् |
८ क
विराट पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
अमुञ्चद्धनुषस्तस्य ज्यामक्षय़्यां युधिष्ठिरः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
अमुञ्चन्तं तु पन्थानं तमृषिं नृपसत्तमः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
अमुञ्चन्महतीं शाखां सस्वनां तत्र खेचरः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
अमुह्यंस्तत्र तत्रैव त्रस्ता मृगगणा इव ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
अमुह्यत्तत्र तत्रैव योषिन्मदवशादिव ||
३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
अमूढः को नु युध्येत जानन्प्राज्ञो हिताहितम् ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
अमूढचेतास्त्वथ चित्रसेनो; महागदामापतन्तीं निरीक्ष्य |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६६
भीष्म उवाच
अमूढत्वमसङ्गित्वं कामक्रोधविवर्जनम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
भीष्म उवाच
अमूढश्चिरमूढानां लोकतत्त्वमजानताम् ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
अमूढो मूढरूपेण चरेद्धर्ममदूषय़न् |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय १९१
भीष्म उवाच
अमूनि यानि स्थानानि देवानां परमात्मनाम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
अमूर्तरय़सः पुत्रो गय़ो राजर्षिसत्तमः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
अमूर्तश्चापि मूर्तात्मा ममत्वेन प्रधर्षितः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०२
जनक उवाच
अमूर्तिमन्तावचलावप्रकम्प्यौ च निर्व्रणौ ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भय़कृद्भय़नाशनः ||
१०२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
अमूर्तेस्तस्य कौन्तेय़ साङ्ख्यं मूर्तिरिति श्रुतिः |
१०१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
अमूर्तय़स्ते विज्ञेय़ा आपो मूर्तास्तथा क्षितिः ||
१० ख
स्त्री पर्व
अध्याय २४
गान्धार्यु उवाच
अमूस्तु भूरिश्रवसो भार्याः सात्यकिना हतम् |
११ क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
अमूस्त्वभिसमागम्य स्मरन्त्यो भरतर्षभान् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
अमृतं केवलं भुङ्क्ते इति विद्धि युधिष्ठिर ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
अमृतं च विषं चैव याश्चान्यास्तुल्यजातय़ः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
अमृतं च सुधा चैव स्वाहा चैव वषट्तथा ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १००
नारद उवाच
अमृतं चामृताशेषु सुरभिः क्षरते पय़ः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
अमृतं चाहृतं विष्णो दैत्याश्च निहता रणे |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
अगस्त्य उवाच
अमृतं चैव पानाय़ दत्तमस्मै पुरा विभो |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
अमृतं चैव मृत्युश्च द्वय़ं देहे प्रतिष्ठितम् |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०८
गुरुरु उवाच
अमृतं तदवाप्नोति यत्तदक्षरमव्ययम् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०२
कण्व उवाच
अमृतं दीय़तामस्मै क्रिय़ताममरैः समः ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
अमृतं देय़मित्येव मय़ोक्तः स शचीपतिः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
अमृतं मङ्गलं विद्धि महद्विषममङ्गलम् |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
अमृतं मनसः प्रीतिं सद्यः पुष्टिं ददाति च |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
अमृतं यज्ञशेषं स्याद्भोजनं हविषा समम् |
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८९
भीष्म उवाच
अमृतं विरजःशुद्धमात्मानं प्रतिपद्यते ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
अमृतं वै गवां क्षीरमित्याह त्रिदशाधिपः |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
अमृतं व्रह्मणा पीतं मधुरं प्रसृतं दिवि ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
अमृतं व्राह्मणा गाव इत्येतत्त्रय़मेकतः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
अमृतं व्राह्मणा गावो गन्धर्वाप्सरसस्तथा |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
अमृतं व्राह्मणोच्छिष्टं जनन्या हृदय़ं कृतम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१४
भीष्म उवाच
अमृतं सकलं भुङ्क्त इति विद्धि युधिष्ठिर ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९७
नारद उवाच
अमृतं स्पृश्य संस्पर्शात्सञ्जीवय़ति देहिनः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
च्यवन उवाच
अमृतं ह्यक्षय़ं दिव्यं क्षरन्ति च वहन्ति च |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
अमृतः शाश्वतः स्थाणुर्वरारोहो महातपाः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
अमृतः स नित्यं वसति योऽहिंसां प्रतिपद्यते ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
अमृतत्वाय़ कल्पन्ते न निवर्तन्ति चाभिभो |
७५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
अमृतप्रसवां भूमिं प्राप्नोति पुरुषो ददत् ||
८८ ख