शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अभ्राणामिव रूपाणि विकुर्वन्ति क्षणे क्षणे ||
१५३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
कर्ण उवाच
अभ्राता विदितः पूर्वं युद्धकाले प्रकाशितः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
अभ्रावकाशशीलश्च तस्य वासो निरुच्यते ||
१३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
अभ्रावकाशा वर्षासु हेमन्ते जलसंश्रय़ाः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
भीष्म उवाच
अभय़ं क्रोधशमनं ज्ञानेनैतदवाप्यते ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
अभय़ं च ददौ तस्मै राज्ञे राजन्भृगुस्तथा |
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
अभय़ं च पुनर्दत्तं त्वय़ैवैषां सुरोत्तम |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
अभय़ं च स जग्राह स्वसैन्ये वै महीपतिः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
अभय़ं चानिमित्तं च न च क्लेशभय़ावृतम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
अभय़ं तस्य भूतानि ददतीत्यनुशुश्रुमः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
अभय़ं यस्य भूतेभ्यो भूतानामभय़ं यतः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
अभय़ं रौद्रकर्माणं दुर्विमोचनमेव च |
९६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
अभय़ं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानय़ोगव्यवस्थितिः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
अभय़ं सर्वभूतानां प्रददौ योगय़ुक्तवान् ||
३५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
अभय़ं सर्वभूतेभ्यः स प्राप्नोति सदा मुने ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
अभय़ं सर्वभूतेभ्यः सर्वेषामभय़ं यतः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१३
भीष्म उवाच
अभय़ं सर्वभूतेभ्यः सर्वेषामभय़ं यतः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वासुदेव उवाच
अभय़ं सर्वभूतेभ्यस्ततस्तस्मै जगत्प्रभुः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
अभय़ं सर्वभूतेभ्यस्तद्दानमतिवर्तते ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
अभय़ं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा चरति यो मुनिः |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
अभय़ं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा नैष्कर्म्यमाचरेत् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६९
भीष्म उवाच
अभय़ं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यः प्रव्रजेद्गृहात् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
अभय़ं सर्वभूतेभ्यो भूतानामभय़ं यतः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
अभय़ं सर्वभूतेभ्यो यो दत्त्वा नाववुध्यते ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
अभय़ं सर्वभूतेभ्यो यो दत्त्वा प्रव्रजेद्द्विजः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
अभय़ं सर्वभूतेभ्यो यो ददाति दय़ापरः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वासुदेव उवाच
अभय़ं सर्वभूतेभ्यो वरय़ामास भारत ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
अभय़ं सर्वभूतेभ्यो व्यसने चाप्यनुग्रहम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२७
सञ्जय़ उवाच
अभय़ं सैन्धवस्याजौ दत्त्वा द्रोणः परन्तपः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
अभय़ः सर्वभूतानां भक्तानां वृषभध्वजः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
अभय़स्यैव यो दाता तस्यैव सुमहत्फलम् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
१०८
वैशम्पाय़न उवाच
अभय़ो रौद्रकर्मा च तथा दृढरथस्त्रय़ः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
अभय़ो रौद्रकर्मा च सुवर्मा दुर्विमोचनः ||
७० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
अमङ्गल्यध्वजं दृष्ट्वा न युध्येय़ं कथञ्चन ||
७४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
अमङ्गल्यध्वजश्चैव याज्ञसेनिर्महारथः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
अमङ्गल्यध्वजे तस्मिन्स्त्रीपूर्वे च विशेषतः |
७८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
अमङ्गल्यानि चैतानि तथाक्रोशो महात्मनाम् |
१०८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
अमत्सरत्वं प्रतिगृह्य चार्थं; सनातनं व्रह्म विशुद्धमाद्यम् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
अमत्सरी सर्वलिङ्गिप्रदाता; वैताननित्यश्च गृहाश्रमी स्यात् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
अमनुष्यैर्हय़ैस्त्रस्तैः कृष्यमाणैस्ततस्ततः ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
अमनोज्ञासुखा वाचः पुरुषस्य पलाय़तः |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
अमन्त्रय़न्त ते सर्वे मुनिभिः सह भारत ||
५१ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
अमन्यत तदात्मानं कृतार्थं कालचोदितः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
७३
वृहदश्व उवाच
अमन्यत नलं प्राप्तं कर्मचेष्टाभिसूचितम् ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
अमन्यत महातेजा वरदो वरमस्य तत् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
अमन्यत महाभाग तथा तच्च न संशय़ः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
अमन्यत महावाहुः कर्म तद्यक्षरक्षसाम् |
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
अमन्यत वधे युक्तान्समर्थांश्च सुय़ोधनः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
१६९
गन्धर्व उवाच
अमन्यत स धर्मात्मा वसिष्ठं पितरं तदा |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
अमन्यत स्थितं ह्येनं प्रहरिष्यन्तमाहवे |
३८ क