आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अभिमन्योः सुभद्राय़ां जन्म चोत्तमतेजसः |
९४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
अभिमन्योर्यथा जातः परिक्षित्परवीरहा |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
अभिमन्योर्वचः कृष्ण प्रिय़त्वात्ते न संशय़ः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
अभिमन्योर्वधं तात धार्मिकः को न पूजय़ेत् ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
अभिमन्योर्वधं वीरः सोऽत्यक्रामत भारत |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
अभिमन्योर्वधं स्मृत्वा प्रतिज्ञामपि चात्मनः |
२५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
अभिमन्योर्विनाशं च कश्चिन्तय़ितुमर्हति ||
२८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
अभिमन्योर्विनाशेन द्रौपदेय़वधेन च |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
अभिमन्योर्विनाशेन न शर्म लभतेऽर्जुनः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
अभिमन्योर्विनाशेन स सन्धेय़ः कथं मय़ा ||
२० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
अभिमन्योर्हतस्यापि प्रभा नैवोपशाम्यति ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
अभिमन्योश्च भद्रं ते प्रिय़स्य सदृशस्य च |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
अभिमन्योश्च वालस्य विनाशं रणमूर्धनि |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
अभिमन्योस्ततस्तैस्तु घोरं युद्धमवर्तत |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
अभिमन्योस्तदा श्राद्धमकुर्वन्सत्यकस्तदा |
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
अभिमन्यौ किलैकस्था दृश्यन्ते गुणसञ्चय़ाः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
अभिमन्यौ हते कर्ण राक्षसे वा घटोत्कचे ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
अभिमन्यौ हते तत्र के वाय़ुध्यन्त मामकाः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
अभिमन्यौ हते तात कथमासीन्मनो हि वः ||
४७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
अभिमन्यौ हते राजञ्शिशुकेऽप्राप्तय़ौवने |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
अभिमन्यौ हते वाले द्रौपद्यास्तनय़ेषु च |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
अभिमन्यौ हते वीर त्वामेष्याम्यचिरादिति ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
अभिमन्यौ हते वीरे भ्रातुः पुत्रे महारथे ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
अभिमानकृतं कर्म नैतत्फलवदुच्यते |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
अभिमानप्रवृत्तेन लोभेन समवस्थिताः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
अभिमानवती नित्यं विशेषेण युधिष्ठिरे |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
अभिमानस्तथा मोहः प्रमादः स्वप्नतन्द्रिता |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
अभिमानस्य घोरस्य वलस्य च नराधिप |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
अभिमानस्य दर्पस्य क्रोधपारुष्ययोस्तथा |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
अभिमानी रणे भीष्मो नित्यं चापि रणप्रिय़ः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
अभिमानी श्रिय़ा मत्तस्तमूचुर्व्राह्मणास्तदा ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
अभिमानेन मत्तः सन्कञ्चिन्नान्यमचिन्तय़म् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४८
नाग उवाच
अभिमानेन मानो मे जातिदोषेण वै महान् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२१
पितामह उवाच
अभिमानेन राजेन्द्र धिक्कृतः स्वर्गवासिभिः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३९
व्यास उवाच
अभिमानो मृषावादो लोभो मोहस्तथाक्षमा |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
अभिमानोऽधिभूतं तु भवस्तत्राधिदैवतम् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
अभिराजो विराजश्च शल्मलश्च महावलः ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
अभिरामः सुरगणो विरामः सर्वसाधनः ||
१४७ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
अभिरामनदीकुञ्जनिर्झरोदरकन्दरम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
अभिरूपं महात्मानं परव्यूहविनाशनम् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
अभिरूपप्रजाय़िन्यो दर्शनीय़ा वहुप्रजाः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
अभिरूपैः कुले जातैर्दक्षैर्भक्तैर्वहुश्रुतैः |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
अभिलक्ष्यैर्निपात्यन्ते तावच्छाम्यतु वैशसम् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
अभिवर्तति लक्ष्मीस्तं प्राचीमिव दिवाकरः ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
द्रौपद्यु उवाच
अभिवादं करोम्येषां गुरूणां कुरुसंसदि |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अभिवादनदक्षं तं पितॄणां वचने रतम् |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः |
६० क
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवादितः कनीय़ोभिर्भ्रातृभिर्भ्रातृवत्सलः |
८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवादितो वधूभिश्च कृष्णाद्याभिः स पार्थिवः |
१९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवाद्य कुरुश्रेष्ठमामन्त्रय़ितुमारभन् ||
४३ ख