द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
अभिपत्याददे क्षिप्रमाय़ुधप्रवरं दृढम् ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
अभिपद्मा यथा नागा भ्राजमाना महारथाः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अभिपन्नं नरैः प्राज्ञैर्वैराग्यमिव मोक्षिभिः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
व्यास उवाच
अभिपन्नतमं लोके राज्ञामुद्यतदण्डनम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
अभिपन्नस्तु राजेन्द्र साम्वो वृष्णिकुलोद्वहः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
अभिपन्नास्मि पाञ्चालि याज्ञसेनि क्षमस्व मे |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६९
भीष्म उवाच
अभिपूजितलाभं हि जुगुप्सेतैव तादृशः ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
अभिपूजितलाभाद्धि विजुगुप्सेत भिक्षुकः ||
२८ ग
आदि पर्व
अध्याय
१९४
वैशम्पाय़न उवाच
अभिपूज्य ततः पश्चादिदं वचनमव्रवीत् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
अभिपूज्य महात्मानं भीमं भीमपराक्रमम् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
अभिपूज्याभिसत्कृत्य पूजार्हमनुमान्य च ||
१९ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
अभिपेतुर्जनं मूढा वार्यमाणाः पुनः पुनः ||
५१ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
अभिपेतुर्धनार्थं ते कालपर्याय़चोदिताः ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
अभिपेतुर्निषादाश्च सौवीराश्च महारणे ||
१०८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
अभिपेतुर्भृशं क्रुद्धाश्छादय़न्त स्म पाण्डवान् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२७४
मार्कण्डेय़ उवाच
अभिपेतुस्तदा राजन्प्रगृहीतोच्चकार्मुकाः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
अभिपेतुस्तमेवाजौ शलभा इव पावकम् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
अभिपेतू रणे पार्थं पतङ्गा इव पावकम् ||
११० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
अभिपेदे महीराज्यमथेन्द्रिय़वशोऽभवत् ||
९८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
अभिपेदेऽर्जुनरथो घनान्भिन्दन्निवांशुमान् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
अभिप्रजाता सा तत्र पुत्रमेकं सुवर्चसम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
अभिप्रणम्य शिरसा द्वाःस्थो धर्मात्मजाय़ वै |
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्याध उवाच
अभिप्रसादय़मृषिं गिरा वाक्यविशारदम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
अभिप्राय़ं च मे नित्यं न वृथा कर्तुमर्हसि ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
अभिप्राय़ं तु कृष्णस्य ज्ञात्वा परपुरञ्जय़ः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
अभिप्राय़ं तु विज्ञाय़ महिष्याः पुरुषर्षभः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
अभिप्राय़ं यो विदित्वा तु भर्तुः; सर्वाणि कार्याणि करोत्यतन्द्रीः |
२३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
अभिप्राय़ं विदित्वा तु भीमसेनस्य फल्गुनः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
अभिप्राय़ं विदित्वास्य द्रोणो वचनमव्रवीत् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अभिप्राय़ः प्रिय़ार्होऽर्हः प्रिय़कृत्प्रीतिवर्धनः ||
१०६ ख
वन पर्व
अध्याय
२८४
वैशम्पाय़न उवाच
अभिप्राय़मथो ज्ञात्वा महेन्द्रस्य विभावसुः |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
अभिप्राय़स्तु मे कश्चित्तं त्वं श्रोतुमिहार्हसि ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
अभिप्राय़स्तु मे कश्चित्तं निवोध जनेश्वर ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
अभिप्राय़स्तु मे कश्चित्तं वै शृणु यथातथम् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२७९
द्युमत्सेन उवाच
अभिप्राय़स्त्वय़ं यो मे पूर्वमेवाभिकाङ्क्षितः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१३०
धृतराष्ट्र उवाच
अभिप्राय़स्य पापत्वान्नैतत्तु विवृणोम्यहम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
अभिप्राय़े तु विदिते धर्मात्मा सव्यसाचिना |
४३ क
सभा पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अभिप्राय़ेण पार्थानां कृष्णस्य च महात्मनः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
अभिप्राय़ोऽस्य विज्ञातो मय़ेति प्रहसन्निव ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
अभिप्रेक्ष्य महावाहुः कृपणं वह्वभाषत ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
अभिप्रेतस्य लाभश्च पूजा च जनसंसदि ||
८० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
अभिप्रेता च या यस्य तस्मै देय़ा युधिष्ठिर |
५ ख
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
अभिप्रेतांस्तु मे कामान्समनुज्ञातुमर्हसि |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
अभिप्रेतानि सर्वाणि भवन्ति कृतकर्मणाम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४८
नागभार्यो उवाच
अभिप्रेतामसङ्क्लिष्टां कृत्वाकामवतीं क्रिय़ाम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अभिप्रेतार्थसिद्ध्यर्थं न्याय़तो यच्च तत्तथा ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
अभिप्रय़ातां समितिं ज्ञात्वा ये प्रतिय़ान्त्यथ |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय
३९
अर्जुन उवाच
अभिप्रय़ामि सङ्ग्रामे यदहं युद्धदुर्मदान् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
अभिप्लुतमभिक्रुद्धमेकपार्श्वावदारितम् |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
अभिभाषति राधेय़ः सर्वसैन्यानि मानदः ||
३५ ख