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द्रोण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
अभिद्रुताः सुसङ्क्रुद्धाः सौभद्रमपराजितम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
अभिद्रुतौ शस्त्रभृतां वरिष्ठौ; शिनिप्रवीरोऽभिससार तूर्णम् ||
७६ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
अभिद्रुत्य च जग्राह रुद्रस्य रथकूवरम् ||
५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
अभिद्रुत्य च विंशत्या क्षुद्रकाणां नरर्षभः |
३५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
अभिद्रुत्य ततो द्रौणिं सव्ये स फलके भृशम् ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय ७३
वृहदश्व उवाच
अभिद्रुत्य ततो राजा परिष्वज्याङ्कमानय़त् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २५६
वैशम्पाय़न उवाच
अभिद्रुत्य निजग्राह केशपक्षेऽत्यमर्षणः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २३१
वैशम्पाय़न उवाच
अभिद्रुत्य महावाहुर्जीवग्राहमथाग्रहीत् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
अभिद्रुत्य महावेगस्ताडय़ामास मूर्धनि ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
अभिद्रुत्य रणे भीममर्जुनं चैव धन्विनौ ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३२
सञ्जय़ उवाच
अभिद्रुत्य शरैस्तीक्ष्णैर्भीमसेनमताडय़न् ||
२० ग
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
अभिद्रुत्य शिरः क्रुद्धश्चिच्छेद कृतवर्मणः ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
अभिद्रुत्य सुशर्माणं शरैरभ्यतुदद्भृशम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय २७१
मार्कण्डेय़ उवाच
अभिद्रुत्याददे प्राणान्वज्रवेगस्य रक्षसः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
अभिद्रुत्याव्रवीद्वाक्यं तिष्ठ तिष्ठेति भारत ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
अभिद्रुह्यति पापात्मा तस्माद्धि विभिषेज्जनात् ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३७
व्रह्मो उवाच
अभिद्रोहस्तथा माय़ा निकृतिर्मान एव च ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय ९
देवदूत उवाच
अभिधत्से ह यद्वाचा रुरो दुःखेन तन्मृषा |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
अभिधत्स्व यथाकामं छेत्तास्मि तव संशय़म् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय ६३
वृहदश्व उवाच
अभिधाव नलेत्युच्चैः पुण्यश्लोकेति चासकृत् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २९६
वैशम्पाय़न उवाच
अभिधावंस्ततो वाचमन्तरिक्षात्स शुश्रुवे |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
अभिधावतु मा कश्चित्पुरुषस्त्रातु चैव ह |
७ क
मौसल पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
अभिधावन्तः श्रूय़न्ते न चादृश्यत कश्चन ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
अभिधावार्जुनेत्येवं मय़श्चुक्रोश भारत ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय २०१
नारद उवाच
अभिधाव्य ततः सर्वास्तौ त्राहीति विचुक्रुशुः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
अभिध्या वै प्रथमं हन्ति चैनं; कामक्रोधौ गृह्य चैनं तु पश्चात् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
अभिध्यापूर्वकं जप्यं कुरुते यश्च मोहितः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
अभिध्याप्रज्ञता चैव सर्वं लोभात्प्रवर्तते ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १४८
हनूमानु उवाच
अभिध्याय़ फलं तत्र धर्मः संन्यास एव च ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
अभिनच्छरवर्षेण द्रोणानीकमनेकधा ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
अभिनत्कुञ्जरानीकमचिरेणैव मारिष ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
अभिनत्पाण्डवानीकं प्रेक्षमाणस्य सात्यकेः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
अभिनत्फल्गुनो वाणै रथिनं च ससारथिम् ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय १६५
गन्धर्व उवाच
अभिनन्दति तां नन्दीं वसिष्ठस्य पय़स्विनीम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
अभिनन्दस्व नः सर्वाः प्रस्नुताः स्नेहविक्लवाः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
अभिनन्द्य महाप्राज्ञ इदं वचनमव्रवीत् ||
६३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
अभिनन्द्य स तानेवं शिरसा लम्वताव्रवीत् |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
अभिनन्द्यास्य तद्वाक्यमिदं वचनमव्रवीत् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अभिनीततरं वाक्यं दृढवादपराक्रमः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
अभिनीततरं वाक्यमित्युवाच युधिष्ठिरम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
अभिनीतानि शस्त्राणि योधाश्च कृतनिश्रमाः ||
८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
अभिनीताश्च शिक्षाभिस्तोत्त्राङ्कुशसमाहताः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
अभिन्नवृत्ता विद्वांसः सद्वृत्ताश्चरितव्रताः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
अभिन्नशरपातत्वाद्गदाय़ुद्धमवर्तत ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२३
वासुदेव उवाच
अभिन्नश्रुतचारित्रस्तस्मात्सर्वत्र पूजितः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
अभिपत्य ततः सेनां विष्वक्सेनधनञ्जय़ौ ||
१५५ ग
मौसल पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
अभिपत्य प्ररुरुदुः परिवार्य धनञ्जय़म् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
अभिपत्य महावाहुर्भीष्मो भीमपराक्रमः ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
अभिपत्य रथैरन्यैरपनीतौ पदानुगैः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
अभिपत्याथ वाहुभ्यां प्रत्यगृह्णादमर्षितः |
५६ क