chevron_left  अभिजानामिarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
अभिजानामि सौम्य त्वां सुहृदं विदुरस्य वै ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
अभिजाने च तदहं यदर्थं मा त्वमागतः |
४१ ख
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
अभिजित्स्पर्धमाना तु रोहिण्या कन्यसी स्वसा |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
अभिज्ञाताः सारवन्तो विपुलाश्चित्रसानवः ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
सौदास उवाच
अभिज्ञानं तु किञ्चित्त्वं समानेतुमिहार्हसि ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
अभिज्ञानं नरेन्द्राणां विकृतं प्रेक्ष्य संय़ुगे |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
अभिज्ञानानि तस्याहुर्मतं हि भरतर्षभ ||
१०१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
अभिज्ञानानि सर्वेषां सञ्ज्ञाश्चाभरणानि च |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
अभिज्ञाय़ द्विजो व्रीडामगमद्वाक्यमाह च ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय ६५
वृहदश्व उवाच
अभिज्ञाय़ सुदेवं तु दमय़न्ती युधिष्ठिर |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
अभिज्ञो दूतवाक्यानां यथोक्तं व्रुवतो मम |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अभिज्ञौ क्षत्रधर्मस्य मम माता पिता च मे |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १७२
वैशम्पाय़न उवाच
अभितः पाण्डवांश्चित्रैरवचक्रे समन्ततः ||
१५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
अभितः शत्रुशिविरं यान्तं साक्षादिवेश्वरम् ||
६६ ख
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
अभितः सोऽथ कल्माषीं गङ्गाकूले परिभ्रमन् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
अभितप्तः शरैश्चैव नातिहृष्टमनाव्रवीत् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
अभितर्जय़मानाश्च रुवन्तश्च महारवान् |
४९ क
वन पर्व
अध्याय २७९
अश्वपतिरु उवाच
अभितश्चागतं प्रेम्णा प्रत्याख्यातुं न मार्हसि ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २०६
व्याध उवाच
अभितश्चापि गन्तव्यं मय़ा स्वर्गं द्विजोत्तम ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
अभितस्तत्र तक्षाणं घटमानं शचीपतिः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
अभितस्ताञ्शरौघेण क्लान्तवाहानवारय़त् ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
भीष्म उवाच
अभितस्तूदय़न्तं तमर्कमर्कमिवापरम् |
११ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
अभितस्त्वामुपासन्ते रक्षणार्थमरिन्दम ||
७७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
अभितापात्स्वभावाच्च पावकः समजाय़त ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
अभिताम्रेक्षणः क्रोधान्निःश्वसन्निव पन्नगः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ४९
सूत उवाच
अभितुष्टाव तं यज्ञं प्रवेशार्थी द्विजोत्तमः ||
२८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
अभितो ये स्थितास्तत्र तस्मिन्नुदककर्मणि ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८९
युधिष्ठिर उवाच
अभितो वर्तमानस्य यथोच्चैःश्रवसस्तथा ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २७
श्रीभगवानु उवाच
अभितो व्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
अभित्वरस्व त्वरितो जहि चैनं पितामहम् ||
८१ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
अभिदुद्राव तं तूर्णं गरुत्मानिव पन्नगम् ||
६६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
अभिदुद्राव तेजस्वी दुर्योधनवलं महत् |
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
अभिदुद्राव तेजस्वी विनदन्यादवर्षभः ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय २७०
मार्कण्डेय़ उवाच
अभिदुद्राव धूम्राक्षो वेगेन महता कपीन् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २९६
वैशम्पाय़न उवाच
अभिदुद्राव पानीय़ं ततो वागभ्यभाषत ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
अभिदुद्राव भीष्मं स भुजप्रहरणो वली ||
५३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
अभिदुद्राव राजानं सिंहो मृगमिवोल्वणः ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय २७४
मार्कण्डेय़ उवाच
अभिदुद्राव रामं च लक्ष्मणं च दशाननः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २७४
मार्कण्डेय़ उवाच
अभिदुद्राव रामं स पोथय़न्हरिय़ूथपान् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
अभिदुद्राव वेगेन कालरात्रिर्यथा नरम् ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
अभिदुद्राव वेगेन कृतवर्माणमाहवे |
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
अभिदुद्राव वेगेन क्रोधसंरक्तलोचनः ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
अभिदुद्राव वेगेन ततोऽनीकमभिद्यत ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
अभिदुद्राव वेगेन तिष्ठ तिष्ठेति चाव्रवीत् ||
८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
अभिदुद्राव वेगेन तिष्ठ तिष्ठेति चाव्रवीत् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
अभिदुद्राव वेगेन दुर्योधनमरिन्दमम् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
अभिदुद्राव वेगेन द्रोणस्य वधकाङ्क्षय़ा |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
अभिदुद्राव वेगेन द्रौणिमाहवशोभिनम् |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
अभिदुद्राव वेगेन धार्तराष्ट्रं वृकोदरः ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
अभिदुद्राव वेगेन पाञ्चाल्यं युद्धदुर्मदम् ||
३३ ख