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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्ववर्तत कौरव्यो हृदय़ेन पराङ्मुखः ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्ववर्तत भीमोऽपि निष्टनन्धर्मजं नृपम् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
अन्ववर्तत राजानं स्वस्ति तेऽस्त्विति चाव्रवीत् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
अन्ववर्तत हित्वा मां कृष्टः कालेन दुर्मतिः ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४३
सञ्जय़ उवाच
अन्ववर्तन्त वेगेन महत्या सेनय़ा सह ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय २२१
वैशम्पाय़न उवाच
अन्ववेक्ष्यैतदुभय़ं क्षमं स्याद्यत्कुलस्य नः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय २२१
शार्ङ्गका ऊचुः
अन्ववेक्ष्यैतदुभय़ं श्रेय़ान्दाहो न भक्षणम् ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वशाद्वै स धर्मात्मा पृथिवीं भ्रातृभिः सह ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
अन्वशासच्च भर्तारं समाहूय़ाभिजल्पती ||
७५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वशासत धर्मात्मा पृथिवीं सागराम्वराम् ||
५ ग
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वशासत्स धर्मज्ञः पुत्रवद्भरतर्षभान् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वशासन्महाराज पितृपैतामहं पदम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वशोचत कौन्तेय़ः प्रिय़ं वै भ्रातरं जय़म् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वशोचन्त गाङ्गेय़मादित्यं पतितं यथा ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वशोचन्त ते सर्वे गान्धारीं च तपस्विनीम् ||
४३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वशोचन्त दुःखार्ता द्रौपदीं च हतात्मजाम् |
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
अन्वश्वं दश धानुष्का धानुष्के सप्त चर्मिणः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
अन्वस्य पितरं ह्यद्य चरतः सर्वतोदिशम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
अन्वागतं भ्रातृभिरप्रमेय़ै; स्तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१०५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
अन्वागतं वृष्णिवरं निशम्य; मध्ये रिपूणां परिवर्तमानम् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
अन्वागतं वृष्णिवरं समीक्ष्य; तथारिमध्ये परिवर्तमानम् |
२० क
सभा पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वारुरोह चाप्येनं प्रेम्णा राजा युधिष्ठिरः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वारुरोह दाशार्हं विदुरः सर्वधर्मवित् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
अन्वारुरोहतुः पार्थं युय़ुधानजनार्दनौ |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
अन्वारूढस्तव पुत्रं रथस्थं; हृष्टश्चापि प्राविशत्स्वं स सैन्यम् ||
६३ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वारोढुं व्यवसिता भर्तारं योषितां वराः ||
१८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वारोहद्धृषीकेशः केतुः सर्वधनुष्मताम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
सुधन्वो उवाच
अन्वालभे हिरण्मय़ं प्राह्रादेऽहं तवासनम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७९
वसिष्ठ उवाच
अन्वालभेद्दक्षिणतो व्रजेच्च; दद्याच्च पात्रे प्रसमीक्ष्य कालम् ||
१० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
अन्वावर्तामहि वय़ं यत्तु तं पापपूरुषम् |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
अन्वाशिष्म वय़मर्जुन त्वय़ि; यिय़ासवो वहु कल्याणमिष्टम् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
अन्वासत दुराधर्षं देवव्रतमरिन्दमम् |
६ क
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वासन्सुचिरं कालं धृतराष्ट्रं तथागतम् ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वास्ते च नदी देवं गङ्गा वै सरितां वरा |
२० क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
अन्वास्यते नरश्रेष्ठ नाराय़णपुरोगमैः ||
१४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
अन्वास्यमानः सततं विदुरेण महात्मना ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वास्यमाना मुनिभिः सान्त्व्यमानाश्च भारत ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विरोचन उवाच
अन्वाहरन्तु फलकं कूर्चं वाप्यथ वा वृसीम् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
अन्वाहार्यं महाराज पितॄणां श्राद्धमुच्यते |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
अन्वाहार्येषूत्तमदक्षिणेषु; तथारूपं कर्म विख्याय़ते ते ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
अन्वाहार्योपकरणं द्रव्योपकरणं च यत् |
११८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
अन्विच्छतां शुभं कर्म नराणां त्यजतां सुखम् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
अन्विच्छन्तः शरीरं तु भारद्वाजस्य पार्थिवाः |
६१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
अन्विच्छन्ती महच्छ्रेय़ो गान्धारी वाक्यमव्रवीत् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
अन्विच्छन्नैष्ठिकं कर्म धर्मनैपुणदर्शनात् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
अन्विच्छन्परिचक्राम व्राह्मणावसथान्वहून् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्विता राजशार्दूल पाण्डवा मुदमाप्नुवन् ||
८२ ख
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्विताश्च शतघ्नीभिः समधूच्छिष्टमुद्गराः ||
५ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्विष्य दाहय़ामास पुरुषैराप्तकारिभिः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
अन्विष्य मनसा युक्तस्तत्त्वदर्शी निरुत्सुकः ||
५५ ख