शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यास्त्रितो वहुतरा गावः समुपलप्स्यते ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
अन्याय़मनुवर्तेत स्थिरवुद्धिरलोलुपः ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
अन्याय़वृत्तः कुरुपाण्डवेय़ा; नध्यातिष्ठद्धार्तराष्ट्रो दुरात्मा ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
अन्याय़वृत्तः पुरुषो न परस्य न चात्मनः ||
१४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
अन्याय़श्चावितर्कश्च विकर्मसु च याः क्रिय़ाः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
अन्याय़समुपात्तेन दानधर्मो धनेन यः |
३२ क
सभा पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
अन्याय़ेन तथोक्तस्तु विदुरो विदुषां वरः |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
अन्याय़ेन तु युध्यन्वै हन्यादेष सुय़ोधनम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
अन्याय़ेन प्रवृत्तानि निवृत्तानि तथैव च |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्याय़ेन हतं दृष्ट्वा गदाय़ुद्धेन भारत |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१५२
राक्षसा ऊचुः
अन्याय़ेनेह यः कश्चिदवमन्य धनेश्वरम् |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्याय़ोपगतं द्रव्यमतीतं यो ह्यपण्डितः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५२
युधिष्ठिर उवाच
अन्ये कलिय़ुगे धर्मा यथाशक्तिकृता इव ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
अन्ये कलिय़ुगे धर्मा यथाशक्तिकृता इव ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
अन्ये कृतय़ुगे धर्मास्त्रेताय़ां द्वापरेऽपरे |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५२
युधिष्ठिर उवाच
अन्ये कृतय़ुगे धर्मास्त्रेताय़ां द्वापरेऽपरे |
८ क
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
अन्ये च ऋषय़ः सिद्धा धर्मेणैव सुचेतसः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
अन्ये च तावका योधाः पाण्डवानां महारथान् |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
अन्ये च पार्थिवाः शेषाः समय़ं चक्रिरे तदा |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
अन्ये च ये कुरवस्तत्र सन्ति; यथार्जुनान्नास्त्यपरो धनुर्धरः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
अन्ये च रथिनः शूरा भीमसेनधनञ्जय़ौ |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्ये च वहवः क्लेशास्त्वशक्तैरिव नित्यदा ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
अन्ये च वहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
अन्ये च वहवः शूरा विव्यधुस्तं समन्ततः ||
१३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
अन्ये च वहवः शूराः पाञ्चालाश्च सहानुगाः ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
अन्ये च वहवः शूराः शस्त्रवन्तो दुरासदाः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
अन्ये च वहवो म्लेच्छा विविधाय़ुधपाणय़ः |
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अन्ये च वेदविद्वांसः कृतप्रज्ञा द्विजातय़ः |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
अन्ये च शतशस्तुष्टैर्मनोभिर्मनुजर्षभ |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
अन्ये चान्वपतन्द्रोणं त्यक्तात्मानो महौजसः ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
अन्ये चैतत्प्रपद्यन्ते विय़ोगे तस्य देहिनः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
अन्ये छत्रं वरूथं च वन्धुरं च तथापरे |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
अन्ये ततोऽपरिज्ञाता ह्रस्वा ह्रस्वोपजीविनः |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
अन्ये तथामितवलाः परस्परवधैषिणः ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५२
युधिष्ठिर उवाच
अन्ये तानाहुरुन्मत्तानपि चावहसन्त्युत ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
अन्ये तु दृष्ट्वा राधेय़ं क्रोधरक्तेक्षणाव्रुवन् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्ये तु नानानृपपुत्रपौत्राः; कृष्णागतैर्नेत्रमनःस्वभावैः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
अन्ये तु विरथाः शूरा रथमन्यस्य संय़ुगे |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
अन्ये तु सर्वे नापश्यन्भारद्वाजस्य धीमतः |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
१०
डुण्डुभ उवाच
अन्ये ते भुजगा विप्र ये दशन्तीह मानवान् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
अन्ये त्वरोचय़न्सर्वे कृच्छ्रेण तु युधिष्ठिरः ||
७० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्ये धूर्ततरा दक्षा निभृताः साधुकारिणः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
अन्ये भीष्माच्छान्तनवात्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
६८ ख
वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
अन्ये मामभ्यधावन्त निवातकवचा युधि |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
अन्ये लोकाः शाश्वता वीतशोकाः; समाकीर्णा गोप्रदाने रतानाम् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
अन्ये वलमदोन्मत्ताः परिघैर्वाहुशालिनः |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
अन्ये वै तं वधिष्यन्ति येषामागः करोति सः |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
अन्ये शमं प्रशंसन्ति व्याय़ाममपरे तथा |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मय़ोगेन चापरे ||
२४ ख