शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अन्यत्राभ्यवहारार्थात्तत्रापि च वुधा वय़म् ||
१५० ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यत्रार्जुनभीमाभ्यां त्वय़ा वा मधुसूदन ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यत्रौशीनराच्छैव्याद्राजर्षेरिन्द्रविक्रमात् ||
३८ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
अन्यथा चिन्तितं कार्यमन्यथा तत्तु जाय़ते |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
अन्यथा चिन्तिता ह्यर्था नरैस्तात मनस्विभिः |
५० क
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यथा चिन्तितो ह्यर्थः पुनर्भवति चान्यथा ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७८
नकुल उवाच
अन्यथा चिन्तितो ह्यर्थः पुनर्भवति सोऽन्यथा |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
४२
जरत्कारुरु उवाच
अन्यथा न करिष्ये तु सत्यमेतत्पितामहाः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७५
भगवानु उवाच
अन्यथा परिदृष्टानि कविभिर्दोषदर्शिभिः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
अन्यथा परिदृष्टानि मुनिभिर्वेददर्शिभिः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
अन्यथा परिवर्तन्ते वेगा इव नभस्वतः ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७५
भगवानु उवाच
अन्यथा परिवर्तन्ते वेगा इव नभस्वतः ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
अन्यथा पाण्डवेय़ानां नाभविष्यज्जय़ः क्वचित् ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय
९२
प्रतीप उवाच
अन्यथा प्रतिपन्नं मां नाशय़ेद्धर्मविप्लवः ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
अन्यथा प्रतिपन्नास्तु विवृद्धा ये च कर्मसु |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
अन्यथा प्रतिपन्नास्तु विवृद्धाः स्वेषु कर्मसु |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यथा मां चिकीर्षन्तमन्यथा मन्यसेऽच्युत |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
देवशर्मो उवाच
अन्यथा रक्षतः शापोऽभविष्यत्ते गतिश्च सा ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
भीष्म उवाच
अन्यथा राजशार्दूल न शक्या रक्षितुं स्त्रिय़ः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
इन्द्र उवाच
अन्यथा वर्तमानस्य न सा वृत्तिः प्रकल्प्यते |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२३१
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यथा वर्तमानानामर्थो जातोऽय़मन्यथा |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
अन्यथा वहुवुद्ध्याढ्यो वाक्यं वदति संसदि |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
अन्यथा विजय़श्चास्य संनतिश्चापरो गुणः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
अन्यथा विहितः सङ्ख्ये वधः शत्रोर्जनाधिप ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७८
नकुल उवाच
अन्यथा वुद्धय़ो ह्यासन्नस्मासु वनवासिषु |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५
वासुदेव उवाच
अन्यथा ह्याचरन्कर्म पुरुषः स्यात्सुवालिशः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
अन्यथा ह्युचिताः पूर्वं परद्रव्यापहारिणः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
अन्यथैव प्रभुस्तानि करोति विकरोति च ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
अन्यथैव हि गच्छन्ति दैवादिति मतिर्मम ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
अन्यथैव हि मन्यन्ते पुरुषास्तानि तानि च |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
अन्यथैव ह्यहंमानी दुर्वलं वदते वचः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
अन्यदञ्चितपक्ष्मान्तं दक्षिणं निःसृतं मुखम् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
अन्यदादत्त वेगेन कार्मुकं समरे दृढम् ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अन्यदादत्त वेगेन धनुर्भल्लांश्च षोडश ||
५३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
अन्यदादत्त वेगेन धनुर्भल्लांश्च षोडश ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
अन्यदादत्त वेगेन धनुर्भारसहं दृढम् |
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
अन्यदादत्त वेगेन धनुर्भारसहं नवम् ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
अन्यदादत्त वेगेन वेगवत्तरमाय़ुधम् ||
७३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
अन्यदादत्त वेगेन शैनेय़ः सशरं धनुः ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
अन्यदादत्त सुमहच्चापं संरक्तलोचनः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
अन्यदादत्तवांश्चित्रं कार्मुकं वेगवत्तरम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
अन्यदेव च क्षेत्रं स्यादन्यः क्षेत्रज्ञ उच्यते |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
अन्यदेव च ज्ञानं स्यादन्यज्ज्ञेय़ं तदुच्यते |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
अन्यदेव भवेद्वासः शय़नीय़े नरोत्तम |
७९ क
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यदेवाय़ुधं किञ्चित्प्रतिपद्यस्व मानुषम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
अन्यदेहविषक्तो हि शावं काष्ठमुपासते ||
५५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
अन्यद्धनुरुपादाय़ शरांश्चाशीविषोपमान् |
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
अन्यद्रथ्यासु देवानामर्चाय़ामन्यदेव हि ||
७९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्यद्रूपं समास्थाय़ विकृतं भैरवं महत् ||
५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
अन्यद्रोचय़ते वस्त्रमेवं देहाः शरीरिणाम् ||
६ ख