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वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तो नास्ति पिपासाय़ाः सन्तोषः परमं सुखम् ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
अन्तो नास्ति पिपासाय़ास्तुष्टिस्तु परमं सुखम् |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तो नूनं कुलस्यास्य कुरवस्तन्निवोधत ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय ५९
विदुर उवाच
अन्तो नूनं भविताय़ं कुरूणां; सुदारुणः सर्वहरो विनाशः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
अन्त्यप्राप्तिं सुखामाहुर्दुःखमन्तरमन्तय़ोः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्त्या मध्या भविष्यन्ति मध्याश्चान्तावसाय़िनः |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय ४६
दुर्योधन उवाच
अन्त्याः सर्वे पर्युदस्ता युधिष्ठिरनिवेशने ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७२
भीष्म उवाच
अन्त्याय़ामप्यवस्थाय़ां किमु स्फीतस्य भारत ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
अन्त्येषु रेमिरे धीरा न ते मध्येषु रेमिरे |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
अन्त्येष्वपि हि जातानां वृत्तमेव विशिष्यते ||
३९ ख
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्धं जडं वलं प्राहुः प्रणेतव्यं विचक्षणैः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्धं तम इवेदं स्यान्न प्रज्ञाय़ेत किञ्चन |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
अन्धं तमस्तमिस्रं च दक्षिणाय़नमेव च |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
अन्धं वृद्धं च तं मत्वा न सा देवी जगाम ह |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
अन्धं वृद्धं च मां मत्वा सुदेष्णा महिषी तव |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अन्धं वृद्धं च मां वीर विहाय़ क्व नु गच्छसि ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
भीष्म उवाच
अन्धः करणहीनेति न वै राजा पिता तव |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
अन्धः स्यादन्धवेलाय़ां जडः स्यादपि वा वुधः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
अन्धः स्यादन्धवेलाय़ां वाधिर्यमपि संश्रय़ेत् ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय ५५
विदुर उवाच
अन्धका यादवा भोजाः समेताः कंसमत्यजन् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
अन्धका वृष्णय़श्चैव प्रद्युम्नप्रमुखास्ततः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
अन्धकारकदेशात्तु मुनिदेशः परः स्मृतः |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
अन्धकारमिवाकाशमभवत्तत्र तत्र ह ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
अन्धकारा हि मे लोका जाता वेदैर्विनाकृताः |
३० ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्धकारां सुविपिनां गहनां कीटसेविताम् ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
अन्धकारात्परो राजन्मैनाकः पर्वतोत्तमः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
अन्धकारे प्रवेष्टव्ये दीपो यत्नेन धार्यताम् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्धकारेऽर्जुनाय़ान्नं न देय़ं ते कथञ्चन ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अन्धत्वाद्यदि तेषां तु न मे रूपनिदर्शनम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६७
व्यास उवाच
अन्धनेत्रा यथैवान्धा नीय़मानाः स्वकर्मभिः ||
१४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्धस्य नृपतेः पुत्रा मय़ा परिघवाहुना |
७ क
वन पर्व
अध्याय १३३
अष्टावक्र उवाच
अन्धस्य पन्था वधिरस्य पन्थाः; स्त्रिय़ः पन्था वैवधिकस्य पन्थाः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७५
समङ्ग उवाच
अन्धा जडाश्च जीवन्ति पश्यास्मानपि जीवतः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
अन्धाञ्जडान्द्रव्यहीनांश्च गङ्गा; यशस्विनी वृहती विश्वरूपा |
८२ क
विराट पर्व
अध्याय १७
द्रौपद्यु उवाच
अन्धान्वृद्धांस्तथानाथान्सर्वान्राष्ट्रेषु दुर्गतान् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
अन्धाश्च तमसा लोका न प्रकाशन्त संवृताः |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
अन्धाश्च सर्वे स्थविरास्तथैव; हस्ताजीवा वहवो येऽत्र सन्ति |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
धृतराष्ट्र उवाच
अन्धे तमसि मग्नानामासीत्का वो मतिस्तदा ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
अन्धे तमसि मज्जेय़ुरगोपाः पशवो यथा ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
अन्धे तमसि मज्जेय़ुरपश्यन्तः परस्परम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्धे तमसि मज्जेय़ुर्यदि दण्डो न पालय़ेत् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
अन्धे तमसि मूढानि पुत्रस्य तव मन्त्रिते ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
अन्धेन तमसा लोकाः प्रावृता न चकाशिरे |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय ४९
दुर्योधन उवाच
अन्धेनेव युगं नद्धं विपर्यस्तं नराधिप |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
अन्धो जड इवाशङ्को यद्व्रवीमि तदाचर ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
अन्ध्रकाश्च पुलिन्दाश्च किराताश्चोग्रविक्रमाः |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्ध्रांस्तलवनांश्चैव कलिङ्गानोष्ट्रकर्णिकान् ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
अन्ध्राश्च वहवो राजन्नन्तर्गिर्यास्तथैव च |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
अन्नं च नो वहु भवेदतिथींश्च लभेमहि |
११४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
अन्नं चापि प्रभवति पानीय़ात्कुरुसत्तम |
११ क