विराट पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तःपुरे श्लाघमान इदं वचनमव्रवीत् ||
२१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तःपुरेषु च तदा सुमहान्रुदितस्वनः |
४२ क
विराट पर्व
अध्याय
६७
अर्जुन उवाच
अन्तःपुरेऽहमुषितः सदा पश्यन्सुतां तव |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
अन्तःसर्प इवागारे वीरपत्न्या इवालय़े |
५० ख
सभा पर्व
अध्याय
९
नारद उवाच
अन्तःसलिलमास्थाय़ विहिता विश्वकर्मणा |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२९
व्यास उवाच
अन्तःस्थं च वहिष्ठं च येऽऽधिय़ज्ञाधिदैवतम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
पञ्चचूडो उवाच
अन्तकः शमनो मृत्युः पातालं वडवामुखम् |
२९ क
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
अन्तकः शमनो मृत्युस्तथाग्निर्वडवामुखः |
२५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
अन्तकः सर्वभूतानां देहिनां सर्वहार्यसौ ||
७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
अन्तकः सर्वभूतानां प्राणान्काल इवागते ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
अन्तकप्रतिमं वीरं कुर्वाणं कर्म दारुणम् ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तकप्रतिमः कोपे क्षमय़ा पृथिवीसमः ||
१२ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अन्तकप्रतिमः क्रोधे सिंहसंहननो वली ||
५९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
अन्तकप्रतिमश्चोग्रां रात्रिं युद्ध्वादहत्प्रजाः ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
अन्तकप्रतिमो वेगे शक्रतुल्यपराक्रमः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
अन्तकस्येव भूतानि जिहीर्षोः कालपर्यये ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
अन्तकाक्रीडसदृशे भीरूणां भय़वर्धने |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
अन्तकाभममित्राणां कर्णं हत्वा महाहवे |
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
अन्तकाल इवादित्यः कृत्स्नं संशोषय़ेज्जगत् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
अन्तकालमिव प्राप्तं मेनिरे वीक्ष्य सैनिकाः ||
११६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१०९
मृग उवाच
अन्तकाले च संवासं यय़ा गन्तासि कान्तय़ा |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
अन्तकाले च सम्प्राप्ते कालो भूत्वातिदारुणः |
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
अन्तकाले च सम्प्राप्ते य इच्छेदाश्रमान्तरम् |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
अन्तकाले यथा क्रुद्धः सर्वभूतानि प्रेतराट् |
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
अन्तकाले यथा भूमिर्विनिकीर्णैर्महीधरैः ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
अन्तकाले वय़ोत्कर्षाच्छनैः कुर्यादनातुरः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
अन्तकाले ह्युपासन्नास्तपसा दग्धकिल्विषाः ||
२५ ख
मौसल पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तज्ञो मतिमांस्तस्य भवितव्यं तथेति तान् ||
१३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
अन्ततो दय़ितं घ्नन्ति केचिदप्यपरे जनाः |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तप्राप्तिं सुखामाहुर्दुःखमन्तरमन्तय़ोः ||
९६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
अन्तमद्य करिष्यामि तस्य दुःखस्य पार्षत |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
अन्तमद्य गमिष्यामि यदि नोत्सृजसे रणम् ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
अन्तमद्य गमिष्यामि शत्रूणां निशितैः शरैः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
अन्तरं च प्रहारेषु तर्कय़न्तौ महारथौ |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
अन्तरं तस्य राजर्षेरन्विच्छन्निय़तात्मनः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
अन्तरं ददृशे कश्चिन्निघ्नतः शात्रवान्रणे ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
अन्तरं नाध्यगच्छन्त चरन्तः शीघ्रगामिनः ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
अन्तरं पाण्डवश्रेष्ठ पश्यामि नहतं शरैः ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तरं प्रददौ पार्थो द्रोणस्य व्यपसर्पितुम् ||
६८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
अन्तरं भीमसेनस्य प्रापतन्नमितौजसः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
अन्तरं यस्य संरव्धा न पश्यन्ति महारथाः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
अन्तरं लिप्समानानामय़ं दोषो निरन्तरः ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
अन्तरं लिप्समानेषु वालस्त्वं नाववुध्यसे ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तरं समभिप्रेप्सुर्नाम्ना ख्यातो जटासुरः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
अन्तरं ह्यस्य दृष्ट्वैव लोको विकुरुते ध्रुवम् |
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
अन्तरस्थं विवृण्वानाः श्रेय़ः कुर्युर्न ते ध्रुवम् ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय
४३
कर्ण उवाच
अन्तरा छिद्यमानानां पुङ्खानां व्यतिशीर्यताम् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
अन्तरा छिध्यमानानि शरीराणि शिरांसि च |
१२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१४
भीष्म उवाच
अन्तरा प्रातराशं च साय़माशं तथैव च |
९ क