सभा पर्व
अध्याय
६१
कश्यप उवाच
अनेना भवति श्रेष्ठो मुच्यन्ते च सभासदः |
७१ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
अनेना युवनाश्वश्च ककुत्स्थो विक्रमी रघुः ||
१७२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
अनेनाप्रतिवुद्धेति वदन्त्यव्यक्तमच्युतम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
अनेनाप्रतिवोधेन प्रधानं प्रवदन्ति तम् |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४५
व्राह्मण उवाच
अनेनार्थेन चास्म्यद्य सम्प्राप्तः पन्नगालय़म् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९३
मार्कण्डेय़ उवाच
अनेनाश्चापि काकुत्स्थः पृथुश्चानेनसः सुतः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
अनेनास्त्रेण ते गुप्तः सुतः परवलार्दनः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
अनेनास्त्रेण सङ्ग्रामे तेजसा च ज्वलिष्यसि ||
५० ग
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
अनेनास्त्रेण सुमहत्त्वं हि कर्म करिष्यसि ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
अनेनास्मत्कृते राज्ञा शापः प्राप्तो महात्मना |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
अनेनाहं भृशं तप्ये गुणदोषौ मदाश्रय़ौ ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९४
भीष्म उवाच
अनेनाहं विधानेन संनद्धः सततोत्थितः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१७०
गन्धर्व उवाच
अनेनैव च विख्यातो नाम्ना लोकेषु सत्तमः |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
अनेनैव प्रकारेण प्रगृहीतं पुरातनैः |
२७ क
विराट पर्व
अध्याय
३४
उत्तर उवाच
अनेनैव मुहूर्तेन पुनः प्रत्यानय़े पशून् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४१
व्यास उवाच
अनेनैव विधानेन भवेद्गर्भशय़ो महान् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
अनेनैव विधिना सम्प्रवृत्तो; गुणादाने व्रह्मशरीरमेति ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
अनेनैवाभ्युपाय़ेन पाण्डवेभ्यो विभित्ससि ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
अनेमि चक्रं परिवर्ततेऽजरं; माय़ाश्विनौ समनक्ति चर्षणी ||
६४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
अनेय़ः श्रेय़सां पापो धार्तराष्ट्रो जनार्दन ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
अनेय़श्चाभिमानेन वालवुद्धिरमर्षणः |
९० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
कृप उवाच
अनेय़स्त्ववमानी यो दुरात्मा पापपूरुषः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
अनेय़स्याश्रेय़सो दीर्घमन्यो; र्मित्रद्रुहः सञ्जय़ पापवुद्धेः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
अनैभृत्येन वै तस्य दीक्षितव्रतमाचरेत् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
अनैश्वर्येण युक्तस्य गतिर्भव सनातन ||
१६४ ख
आदि पर्व
अध्याय
७९
यय़ातिरु उवाच
अनो त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरय़ा सह |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
८६
यय़ातिरु उवाच
अनोकसारी लघुरल्पचार; श्चरन्देशानेकचरः स भिक्षुः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
अनौपम्यममूर्तं च भगवानाह वुद्धिमान् |
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अन्तं करिष्यामि यथा कुरूणां; त्वय़ाहमिन्द्रानुज सम्प्रय़ुक्तः ||
१०० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
अन्तं गच्छन्ति राजेन्द्र तथा योगाः सुदुर्वलाः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
अन्तं गत्वा कर्मणां या प्रशंसा; सत्यं दमश्चार्जवमानृशंस्यम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तं धीरा निषेवन्ते मध्यं ग्राम्यसुखप्रिय़ाः |
९५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तं नूनं करिष्यामि क्षत्रिय़ाणां जनार्दन ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
अन्तं पार्थाः करिष्यन्ति वीर्यामर्षसमन्विताः ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
अन्तं यथा गमिष्यामि शत्रूणां शत्रुकर्शन ||
६८ ख
सभा पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तः कामं कुलस्यास्तु न शक्ष्यामि निवारितुम् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अन्तः शरीरे तस्याहं वर्षाणामधिकं शतम् |
११० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
अन्तःक्षुरा वाङ्मधुराः कूपाश्छन्नास्तृणैरिव |
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तःपुरं ततस्तस्य व्राह्मणस्य महात्मनः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४८
नाग उवाच
अन्तःपुरगतं वत्सं श्रुत्वा रामेण निर्हृतम् |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
अन्तःपुरचरा ये च द्वेष्टि यानहिताश्च ये ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तःपुरचराश्चैव कुरुभिर्गोधनं हृतम् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तःपुरमुपस्थाय़ द्वाःस्थं वचनमव्रवीत् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
अन्तःपुरसमीपस्थे वन आस्ते रहोगतः ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तःपुराणां च तदा महानार्तस्वरोऽभवत् |
४० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तःपुराणां रुदतां दृष्ट्वा कुन्तीं तथागताम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तःपुराणां सर्वेषां भृत्यानां चैव सर्वशः |
५० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
अन्तःपुराणि राज्ञां च नानादेशनिवासिनाम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
अन्तःपुरे तं तु निवेश्य राजा; विभाण्डकस्यात्मजमेकपुत्रम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
२०४
नारद उवाच
अन्तःपुरे वनोद्याने पर्वतोपवनेषु च |
५ क