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उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजग्मुः सहामात्या राजानश्चापि सर्वशः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजग्मुर्नरव्याघ्रं देवा इव शतक्रतुम् ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजग्मुर्महात्मानं क्षत्रिय़ाश्च विशोऽपि च ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजग्मुर्महात्मानं त्रिदशेन्द्रस्य संमते ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय १०२
लोमश उवाच
अनुजग्मुर्महात्मानं द्रष्टुकामास्तदद्भुतम् ||
२० ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजग्मुर्महात्मानं पाण्डुपुत्रं धनञ्जय़म् ||
३३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजग्मुर्महात्मानं सदारं तं महीपतिम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय २०६
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजग्मुर्महात्मानो व्राह्मणा वेदपारगाः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजग्मुर्महेष्वासा धार्तराष्ट्रं महावलम् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजग्मुर्महेष्वासाः प्रवीरा भरतर्षभाः ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
अनुजग्मुर्महेष्वासाः सर्वलोकस्य धन्विनः |
२३ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजग्मुश्च तं वीरं देव्यस्ता वै स्वलङ्कृताः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजग्मुश्च तत्रैतान्स्नेहात्केचिद्द्विजातय़ः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
अनुजग्मुस्ततो वाला ग्रामिपुत्राः कुतूहलात् ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजज्ञे जय़ाशीर्भिरभिनन्द्य युधिष्ठिरम् ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजज्ञे ततो वीरं भ्राता भ्रातरमग्रजः ||
१४ ग
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजज्ञे तदा ज्येष्टामम्वां काशिपतेः सुताम् ||
५१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजज्ञे स कौरव्यः परिष्वज्याभिनन्द्य च ||
४७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजज्ञे सशिष्यान्वै विधिवत्प्रतिपूज्य च ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजां वासुदेवस्य सुभद्रां भद्रभाषिणीम् ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय १५६
युधिष्ठिर उवाच
अनुजांस्तु न जानामि गच्छेय़ुर्नेति वा पुनः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
अनुजातः स वीर्येण वासुदेवं च शत्रुहा ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजानाति राजर्षे यच्चान्यदपि किञ्चन ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
अनुजानामि कर्ण त्वां युध्यस्व स्वर्गकाम्यया ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
शल्य उवाच
अनुजानामि चैव त्वां युध्यस्व जय़माप्नुहि ||
७५ ख
सभा पर्व
अध्याय ६१
सुधन्वो उवाच
अनुजानामि ते पुत्रं जीवत्वेष शतं समाः ||
७९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वासुदेव उवाच
अनुजानामि भीष्म त्वां वसूनाप्नुहि पार्थिव |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
द्रोण उवाच
अनुजानामि युध्यस्व विजय़ं समवाप्नुहि ||
४९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७०
व्यास उवाच
अनुजानामि राजंस्त्वां क्रिय़तां यदनन्तरम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २७५
दशरथ उवाच
अनुजानामि राज्यं च प्रशाधि पुरुषोत्तम ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
अनुजानामि वः पार्थाः प्रहरध्वं यथासुखम् ||
६६ ग
आदि पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजानामि वां वीरौ चरतं यत्र वाञ्छितम् ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १४
धृतराष्ट्र उवाच
अनुजानीत भद्रं वो व्रजावः शरणं च वः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
कर्ण उवाच
अनुजानीष्व मां तात युद्धे प्रीतमनाः सदा |
२७ क
स्त्री पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजानीहि नो राज्ञि मा च शोके मनः कृथाः ||
१६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजानीहि पितरं समय़ोऽस्य तपोविधौ |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६९
व्राह्मण उवाच
अनुजानीहि मां कृष्ण गच्छेय़ं दिवमद्य वै ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजानीहि मां कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
युधिष्ठिर उवाच
अनुजानीहि मां तात आशिषश्च प्रय़ोजय़ ||
३२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजानीहि मां राजंस्तापस्ये भरतर्षभ ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
अनुजानीहि मां राजन्गमिष्यामि गृहान्प्रति ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
अनुजानीहि मां राजन्गमिष्यामि यथागतम् |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
अनुजानीहि मां राज्ञि करिष्ये वचनं तव |
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
अनुजानीहि मां व्रह्मन्ध्याय़स्व च शिवेन माम् |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
अनुजानीहि मामार्य सुतौ मे परिरक्ष च ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
अनुजानीहि समरे कर्णमाहवशोभिनम् |
४० क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
अनुजाने भवन्तम् |
१७६ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजीवन्तु सर्वे त्वां ज्ञातय़ो ज्ञातिवर्धन ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
अनुजीविस्वजातिभ्यो गुणेषु परिरक्षणम् ||
६९ ख
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
अनुजैश्च महावाहो तन्मानुज्ञातुमर्हसि ||
२० ख