शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
अनित्यानीह भाग्यानि चतुष्पात्पक्षिणामपि |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
अनित्ये प्रिय़संवासे कथं स्वपिषि पुत्रक ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
अनित्ये प्रिय़संवासे संसारे चक्रवद्गतौ ||
४० ग
उद्योग पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
अनिद्रो निःसुखश्चास्मि कुरूणां शमचिन्तय़ा ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
अनिधाय़ रणे वीर्यमस्त्राणि विविधानि च ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
अनिन्दितो ह्यकामात्माथाल्पेच्छोऽथानसूय़कः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
अनिन्द्यरूपा सुविशालनेत्रा; शरीरतुल्या कुरुपुङ्गवानाम् ||
११ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
अनिन्द्रमवलं राष्ट्रं दस्यवोऽभिभवन्ति च ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
अनिन्द्राश्चावला लोकाः सुप्रधृष्या वभूवुः ||
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
अनिन्धनं ज्योतिरिव प्रशान्तं; स व्रह्मलोकं श्रय़ते द्विजातिः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
अनिमन्त्रिते ह्यनाय़ुष्यं गमनं तत्र भारत ||
१३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
अनिमन्त्रितो न गच्छेत यज्ञं गच्छेत्तु दर्शकः |
१३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९०
युधिष्ठिर उवाच
अनिमित्तं परं यत्तदव्यक्तं व्रह्मणि स्थितम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
अनिरुद्ध इति प्रोक्तो लोकसर्गकरः प्रभुः ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
अनिरुद्ध इति प्रोक्तो लोकानां प्रभवाप्ययः ||
१४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
अनिरुद्धात्तथा व्रह्मा तत्रादिकमलोद्भवः ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मेति कथ्यते |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ||
८१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
अनिरुद्धोऽसृजन्मां वै व्रह्माणं लोकधारिणम् ||
६६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
अनिर्जित्य रणे पाण्डून्व्यपय़ास्याव कर्हिचित् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
अनिर्जित्य रणे सर्वानेतान्पुरुषसत्तमान् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेय़ात्मा महाद्रिधृक् ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जय़ः ||
८३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
अनिर्देश्यवय़ोरूपा देवकन्याः स्वलङ्कृताः |
६१ क
आदि पर्व
अध्याय
६६
शकुन्तलो उवाच
अनिर्देश्यवय़ोरूपामपश्यद्विवृतां तदा ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
अनिर्देश्या गतिः सा तु यां प्रपश्यन्ति मोक्षिणः |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय
९
नारद उवाच
अनिर्देश्या वपुष्मन्तः शतशोऽथ सहस्रशः ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
अनिर्देश्यां प्रभावेन सर्वभूतमनोरमाम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
अनिर्देश्यानि मन्यन्ते प्राणान्तानीति धारणा ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५०
नाग उवाच
अनिर्देश्येन रूपेण द्वितीय़ इव भास्करः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
अनिर्देश्योग्रवपुषो देवस्यासह्यतेजसः ||
११९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
अनिर्वाप्य समश्नन्वै ततो जाय़ति वाय़सः ||
७५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतम् ||
१०८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अनिर्विण्णः स्थविष्ठो भूर्धर्मय़ूपो महामखः |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
अनिर्वृतेन मनसा ससर्प इव वेश्मनि ||
६० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
अनिर्वेदः श्रिय़ो मूलं दुःखनाशे सुखस्य च |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
अनिर्वेदः सदा कार्यो निर्वेदाद्धि कुतः सुखम् |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
अनिर्वेदेन दीर्घेण निश्चय़ेन ध्रुवेण च |
११२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
अनिर्वेदो गतक्लेशो गततन्द्रीरमत्सरः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
अनिलस्य शिवा भार्या तस्याः पुत्रः पुरोजवः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
अनिलेन यथाभ्राणि विच्छिन्नानि समन्ततः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
अनिलेन यथाभ्राणि विच्छिन्नानि समन्ततः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
अनिलेनाहृतं भूमौ पतितं जलजं शुचि ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
अनिलेनेरितं घोरमुत्तस्थौ पार्थिवं रजः ||
३९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
अनिलेनेरितो घोरो दिशः पूरय़तीव हि ||
६० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
अनिलो वा वहेन्मेरुं द्यौर्वापि निपतेन्महीम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१५२
भीम उवाच
अनिलोढमितो नूनं सा वहूनि परीप्सति ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
शल्य उवाच
अनिवर्तिनो महाभागानजेय़ान्सत्यविक्रमान् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः |
७७ क